लाल-नीली बत्ती गुल होने के बाद राज्य सरकार ने वीआईपी की स्टेटस सिंबल बन चुके सरकारी बॉडीगार्ड की व्यवस्था पर भी चोट कर दी। गृह विभाग ने जिला सुरक्षा समिति और प्रमंडलीय सुरक्षा समिति को तत्काल भंग करते हुए किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा की जरूरत और बॉडीगार्ड देने का अधिकार विशेष सुरक्षा समिति को सौंप दिया है।
विशेष सुरक्षा समिति सिर्फ मुख्यालय स्तर पर रहेगी और आईजी (सुरक्षा) इसके अध्यक्ष होंगे। इसके कामकाज की मॉनिटरिंग डीजीपी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय सुरक्षा समिति करेगी। यानी कि DM और SP से यह अधिकार छीन लिया गया है। बॉडीगार्ड देने के दो आधार होंगे, पहला पद और दूसरा खतरा।
सरकारी पद के अलावा किसी अन्य को खतरे के आधार पर बॉडीगार्ड देने से पहले उसके व्यवसाय, आय के स्रोत व हथियारों के लाइसेंस की जांच होगी। बॉडीगार्ड की मांग के लिए DM, एसएसपी, SP या IG (सुरक्षा) के कार्यालय में आवेदन देना होगा। एसपी व डीएसपी (विशेष शाखा) इसकी पड़ताल करेंगे। योग्य पाए जाने पर 15 दिनों में दो माह के लिए बॉडीगार्ड देने का प्रस्ताव विशेष सुरक्षा समिति को भेजा जाएगा। प्रस्ताव में लिखा जाएगा कि बॉडीगार्ड मुफ्त में दिया जाएगा या निर्धारित रकम ली जाएगी।
गृह विभाग का मानना है कि जिला सुरक्षा समिति और प्रमंडलीय सुरक्षा समिति द्वारा बड़े पैमाने पर लोगों को अंगरक्षक दे दिया जाता है। इसके लिए बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों को विधि-व्यवस्था से हटाकर अंगरक्षक की जिम्मेदारी देनी पड़ती थी। वीआईपी लोगों को उनके क्षेत्र से बाहर के जिलों से अंगरक्षक उपलब्ध करा देने से अंगरक्षकों की सही संख्या का आकलन नहीं हो पा रहा था। जो सक्षम होते थे, उन्हें भी सरकारी खर्च पर अंगरक्षक दे दिया जाता था।
विशेष सुरक्षा समिति में आईजी (सुरक्षा)- अध्यक्ष एवं एसपी (सुरक्षा) और डीजीपी के सहायक (क्यू) सदस्य होंगे, जबकि केंद्रीय सुरक्षा समिति में डीजीपी- अध्यक्ष एवं एडीजी (विशेष शाखा) तथा एडीजी (विधि-व्यवस्था) सदस्य होंगेl

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