कोरोना वायरस संक्रमण के मामले में भारत दुनिया में दूसरे पायदान पर है. अब तक देश में 61 लाख से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं, जबकि 96 हज़ार से ज्यादा इस वायरस की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं. महामारी के इन डरावने आंकड़ों के बावजूद अच्छी खबर ये है कि पिछले कुछ दिनों से देश में कोरोना के नए मामलों में कमी देखी गई है. साथ ही रोज़ाना आने वाले मामलों से ज्यादा अब ठीक होने वाले लोगों की संख्या है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या भारत में कोरोना का पीक आकर जा चुका है?

अगर हम देखें तो पिछले कुछ दिनों में हमारे आंकड़े बढ़ रहे थे, अब कुछ हद तक स्टेबलाइज हुए हैं नंबर, दिल्ली में भी और देश में भी. अगर यही ट्रेंड 10 दिन से 2 हफ्ते के लिए रहता है तो हम यह कह सकते हैं कि हमारा कर्व फ्लैट हो चुका है और फिर धीरे धीरे केस कम होने चाहिए. लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है, क्योंकि कुछ दिन और यह ट्रेंड बना रहना चाहिए. अपने पुराने अनुभव से हमें यह पता है कि कुछ दिन केस कम होते हैं और फिर बढ़ सकते हैं. मेरा मानना है कि अभी हमें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है. दो कारण हैं, जिसकी वजह से केस बढ़ सकते हैं. एक ये कि अगले महीने से हमारे यहां त्यौहार शुरू हो रहे हैं. दुर्गा पूजा है, दशहरा है और कई त्यौहार हैं जो पूरे देश में मनाए जाते हैं, जहां लोग इकट्ठा होते हैं और अगर लोग ध्यान ना रखें, फिजिकल डिस्टेंस का ध्यान ना रखें, भीड़ हुई तो फिर केस बढ़ सकते हैं. दूसरा यह कि मौसम बदल रहा है. मौसम में ठंड के कारण वायरल इनफेक्शन बढ़ने के चांस होते हैं. इसीलिए अगले महीने हमें ज्यादा सतर्क रहना पड़ेगा. तो अगर हम सतर्क रहें तो केसेस नहीं बढ़ेंगे और आहिस्ता आहिस्ता कम होना शुरू हो जाएंगे.

अगर केस कम होकर उसके बाद फिर बढ़ना शुरू हो जाए तो हम यह कह सकते हैं कि सेकंड वेब आ सकती है, लेकिन अभी जो केस बढ़ रहे थे, सब्स्टेनल्ली कम होने चाहिए तभी हम आगे सेकंड वेव की बात कर सकते हैं. जैसे हमने दिल्ली में देखा कि केस कम हो गए थे, हफ्ते भर कम रहे, हजार से कम रहे, लेकिन फिर बाद में शुरू हुए, तो उस टाइप का अगर पूरे देश में भी हम अगर एक पैटर्न देखें, तो हम यही कह सकते हैं कि फिर एक सेकंड वेव आ सकती है.

पिछले दिनों में भारत में भी और हांगकांग में भी दोबारा इंफेक्शन के केस रिपोर्ट हुए हैं और एक कन्फर्म केस हैं. और यह भी हम जानते हैं कि जो कोविड-19 के केस हैं, उनमें वेरिएशन है. हमारे बहुत से मरीज हैं, वह असिम्प्टोमैटिक हैं. उन्हें पता भी नहीं होता कि उन्हें कोरोना है और कुछ ऐसे हैं, जिन्हें बहुत ज्यादा गंभीर हो जाता है और वह वेंटिलेटर पर आ जाते हैं. और यह भी माना जाता है कि जिनको माइल्ड हैं, उनकी बॉडी में इतना इम्यून रिस्पॉन्स नहीं होता तो हो सकता है कि उनके शरीर में कम एंटीबॉडी बनती हो, जो आहिस्ता कम हो जाती हैं और उनको रिइंफेक्शन के चांसेस हो सकते हैं.

इस पर ज्यादा रिसर्च करने की जरूरत है क्योंकि इसमें दो तीन चीजें सामने आ रही हैं. एक कि जब दोबारा इंफेक्शन होता है तो क्या वह माइल्ड फ़ॉर्म का होता है या सीरियस होगा और उसमें कितने प्रिकॉशन लेने की जरूरत है. दूसरा, इसका वैक्सीन के साथ कितना इंप्लीकेशन है, वैक्सीन कितनी टाइप की स्ट्रांग एबिलिटी देगी, कितने लंबे समय तक रहेगी और उसके बाद इंफेक्शन के चांस कितने हैं. यह 2 सवाल बहुत महत्वपूर्ण हैं और जैसे जैसे इसमें रिसर्च होगी कि क्यों हो रहे हैं और रीइन्फेक्शन किस ग्रुप में हो रहा है, उसमें किस टाइप का है, तो इस बारे में ज्यादा पता चल पाएगा.





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