सवर्णों को आर्थिक आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण देने वाला संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पास हो गया. केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत द्वारा इस संदर्भ में प्रस्तुत 124वें संविधान संशोधन विधेयक पर लोकसभा में करीब 5 घंटे चर्चा चली, जिसके बाद हुए मतदान में इसके पक्ष में 323 और विरोध में 3 वोट पड़े.
कांग्रेस ने बिल का विरोध नहीं किया, शुरू में पार्टी ने मांग रखी कि बिल पहले संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में भेजी जाए. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि आप इस बिल का समर्थन कर ही रहे हैं तो आधे मन से नहीं, पूरे दिल से कीजिए. जब यह बिल गरीब सवर्णों के पक्ष में है तो कम्युनिस्टों को भी इसका विरोध नहीं करना चाहिए.
चर्चा के दौरान अरुण जेटली ने कहा कि अधिकतर राजनीतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र जारी करते वक्त अनारक्षित और आर्थिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण दिलाने का जुमला उसमें डाला था. यह कानूनी अड़चनों के जरिए नहीं हो पाया था और आज अगर आप सभी इसका विरोध नहीं कर रहे हैं तो समर्थन भी खुलकर करिए. कम्युनिस्ट भाइयों से कहना चाहूंगा कि जब गरीबी के आधार पर यह आरक्षण दिया जा रहा है, तो भारत ऐसा पहला देश होगा, जहां गरीबों के आरक्षण वाले बिल का कम्युनिस्ट विरोध कर रहे होंगे.
जेटली ने कहा कि यह केवल भाजपा और एनडीए की बात नहीं है, कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने भी एक जैसी भाषा में इस तरह के आरक्षण की बात कही थी. सवाल यह है कि यह बात केवल घोषणा पत्र तक ही सीमित रहेगी या फिर यह कानून बनेगा?
केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि पटेल, जाट, गुर्जर, मुस्लिम, ईसाई और सभी धर्मों के लोग और वे लोग जो एससी-एसटी व ओबीसी आरक्षण के दायरे में नहीं आते, उन्हें इस आरक्षण का लाभ मिलेगा. सारे देश में सामान्य वर्ग के गरीब तबके के लोगों के साथ न्याय होगा.
केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि 10 फीसदी आरक्षण के फैसले से हम खुश हैं. अंबेडकरजी ने इस मुद्दे को उठाया था, हम ना हिंदू हैं, ना हम मुसलमान. मुस्लिमों को पाकिस्तान मिला, हिंदुओं को हिंदुस्तान. हमारे लिए क्या है? तब जाकर आरक्षण मिला था. इसके बाद ओबीसी के लिए आरक्षण हुआ. हम पार्टी-राजनीति में नहीं जाते हैं. अब ऊंची जाति के गरीब लोग ही बचे हैं, ऊंची जाति के गरीब लोगों के लिए यह बिल जरूरी है.
सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि यह जो बिल लाया गया है, आखिरी विधेयक के तौर पर इसे जिस नीयत और नीति से लाया गया है, उसे अवाम भी जानती है. आबादी के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए. हम चाहते हैं कि विचार करने के बाद इस आरक्षण बिल को लाया जाए. मैं इस बिल का समर्थन करता हूं, लेकिन मैं आबादी के अनुपात में 100 फीसदी आरक्षण लाए जाने की मांग करता हूँ.
कांग्रेस सांसद केवी थॉमस ने कहा कि हमें लगता है कि सरकार जल्दबाजी में है और जल्दबाजी में इतना बड़ा फैसला नहीं लिया जाना चाहिए. इसमें कहा गया है कि सरकारी सहायता प्राप्त और गैर-सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में 10% आरक्षण दिया जाएगा. जबकि, एससी-एसटी के लिए गैर-सरकारी संस्थानों में ऐसा नहीं है. नौकरियों की बात आती है, तो सरकार बताए कि रोजगार है कहां? साथ ही जिनकी आय सीमा 8 लाख रुपए सालाना यानी 63 हजार रुपए महीना है, वे अक्षम नहीं हैं. यह कदम केवल चुनावों को देखते हुए उठाया जा रहा है, कोई होमवर्क नहीं किया गया है. हम इसके खिलाफ नहीं हैं. हम आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के साथ हैं, लेकिन आप इतनी जल्दबाजी में यह कदम क्यों उठा रहे हैं? मेरी मांग है कि इस बिल को पहले संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाए.


अन्नाद्रमुक सांसद थम्बीदुराई ने कहा कि आप जो कानून बना रहे हैं, वह सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाएगा. इस देश से जब तक जातिवाद खत्म नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं हो सकता है. आजादी के 70 साल बाद भी यहां जातिवाद क्यों है? उत्तर भारत में कई समुदाय पिछड़ा आरक्षण के दायरे में लाए जाने की मांग कर रहे हैं, आपकी सरकार उनके लिए कुछ क्यों नहीं करती?
इससे पहले बसपा प्रमुख मायावती ने विधेयक का समर्थन करने का ऐलान करते हुए कहा कि सवर्ण आरक्षण के प्रस्ताव का उनकी पार्टी समर्थन करती है. लोकसभा चुनाव से पहले लिया गया यह फैसला सही नीयत से लिया गया नहीं लगता है, यह चुनावी स्टंट और राजनीतिक छलावा लगता है.
आरक्षण के लिए 5 प्रमुख मापदंड रखे गये हैं पहला परिवार की सालाना आमदनी 8 लाख रु. से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, दूसरा परिवार के पास 5 एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि नहीं होनी चाहिए, तीसरा आवेदक के पास 1,000 वर्ग फीट से बड़ा फ्लैट नहीं होना चाहिए, म्यूनिसिपलिटी एरिया में 100 गज से बड़ा घर नहीं होना चाहिए तथा पांचवां नॉन नोटिफाइड म्यूनिसिपलिटी में 200 गज से बड़ा घर न हो.
संविधान संशोधन (124वां) बिल 2019 के पूर्व सोमवार को कैबिनेट ने आरक्षण के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. अभी संविधान में जाति और सामाजिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रावधान है. संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 15 और 16 में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान जोड़ा जाएगा. अभी एससी को 15%, एसटी को 7.5% और ओबीसी को 27% आरक्षण दिया जा रहा है. संविधान के अनुच्छेद 15 में संशोधन के जिसके जरिए राज्यों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों की तरक्की के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार मिलेगा.
इसमें विशेष प्रावधान उच्च शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश से जुड़े हैं. इनमें निजी संस्थान भी शामिल हैं, फिर भले ही वे राज्यों द्वारा अनुदान प्राप्त या गैर अनुदान प्राप्त हों. अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को इसमें शामिल नहीं किया गया है. बिल यह भी साफ करता है कि आरक्षण मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त होगा.
बिल बुधवार को राज्यसभा में पेश होगा. राज्यसभा में सांसदों की मौजूद संख्या 244 है. बिल पारित कराने के लिए दो तिहाई यानी 163 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी. भाजपा (73) समेत एनडीए के पास 88 सांसद हैं. कांग्रेस (50), सपा (13), बसपा (4), राकांपा (4) आप (3) ने बिल का समर्थन किया है. इनकी कुल संख्या 74 होती है. इस तरह एनडीए और बिल का समर्थन कर रहे विपक्षी सांसदों की कुल संख्या 162 हो जाती है. 13-13 सांसदों वाली तृणमूल, अन्नाद्रमुक या बीजद (9), तेदेपा (6) और टीआरएस (6) में से किसी एक के भी समर्थन करने पर यह बिल राज्यसभा में आसानी से पारित हो जाएगा.



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