नेशनल अवार्ड जीतने वाली फिल्म राजकहिनी का हिंदी रिमेक है बेगम जान। श्रीजीत मुखर्जी बंटवारे के समय की एक कहानी बताने की कोशिश करते हैं जो असल में रेडक्लिफ लाइन के आड़े आ रही 11 महिलाओं की कहानी है। फिल्म का कॉन्सेप्ट काफी बोल्ड है और वाकई इसकी तारीफ की जानी चाहिए। हाँलाकि कहीं कही फिल्म में मेलोड्रामा भी देखने को मिलेगा।
विद्या बालन के आईब्रो हों या उनकी धराधड़ गालियां शुरू से ही फिल्म के कैरेक्टर में खुद को समा लेती हैं। वो अपने काम को सबसे ज्यादा वैल्यू देती हैं, आजादी और बंटवारे की उन्हें कोई फिक्र नहीं है। वो जहां रहती हैं वहां की रानी हैं जो भले अपने शब्दों पर कंट्रोल ना करती हो लेकिन कठोर बेगम जान के अंदर एक बहुत ही केयरिंग दिल है। विद्या बालन ने अपने किरदार में पूरा परफेक्शन दिखाया है और हर इंटेस सीन में वो कमाल की लगी हैं। एक सीन में वो बोलती हैं “महीना हमें गिनना आता है साहब, हर बार लाल करके जाता है”। एक सीन में बेगम जान (विद्या बालन) शबनम (मिष्टी) को लगातार थप्पड़ मारते रहती है, जबतक की वो अपने शॉक से बाहर ना निकल जाएl

इसके बाद पल्लवी शारदा (गुलाबो) वेश्या हैं जिनका अतीत दिल दहलाने वाला है।वो अपने रोल में कमाल की लगी हैं और विद्या बालन के साथ स्क्रीन शेयर करने में उन्होंने अपना खुद का स्थान बनाया है। गौहर खान भी रूबिना के किरदार में काफी इंप्रेस करती है। जिस सीन में वो अपनी जिंदगी के बारे में और उस इंसान के बारे में बताती हैं जिससे वो प्यार करती हैं वो शानदार है।
फिल्म की कहानी शुरू होती है कनॉट प्लेस, नई दिल्ली में 2016 में हुई एक झकझोर देने वाली घटना से। इसके बाद फिल्म हमें ले जाती है 70 साल पहले जब भारत आजादी के बाद खूनी लड़ाई के बीच जी रहा था। सर साइरिल रेडक्लिफ ने देश को दो भागों में बांट दिया था और अपने प्रोजेक्ट में कामयाब रहे थे। इसी बंटवारे की चपेट में बेगम जान (विद्या बालन) का कोठा भी आ जाता है। जल्दी ही स्थिति और भी बदतर हो जाती है जब उन्हें नोटिस थमा दी जाती है कि कोठे को भारत और पाकिस्तान के बीच रास्ता बनाने के लिए हटाना पड़ेगा। जब कोई विकल्प नहीं बचता है तो बेगम जान और उनकी पूरी टीम विद्रोह करती है और उस जगह को बचाना चाहती हैं जिसे वो अपना घर कहती हैं।
मिष्टी, रिद्धिमा तिवारी, फ्लोरा साइना ने भी अपने किरदार को बखूबी निभाया है तो ईला अरूण भी बिल्कुल सटीक लगी हैं। नसीरउद्दीन शाह का कैरेक्टर ग्रे शेड में हैं। ट्रैक में रजित कपूर और आशीष विद्यार्थी नहीं जम पाए। पितोबश सबके कैंपिनियन हैं और गौहर से प्यार करते हैं। विवेक मुश्रान भी अपने कैरेक्टर के हिसाब से अच्छे लगे हैं। चंकी पांडे का फिल्म में रोल बहुत अच्छे से लिखा नहीं गया है। फिल्म में पहले उनको काफी शांत दिखाया गया है जो बेगम जान और उनके गैंग से पीछा छुड़ाने के लिए सबकुछ करता है लेकिन अंत तक वो टिक नहीं पाते।

बेगम जान लिखी कहानी से ज्यादा मोमेंट्स है। गोपू भगत की सिनेमैटोग्राफी कमाल की है और उन्होंने बेगम जान की दुनिया को बेहतरीन तरीके से दिखाया है। फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा धीमा है लेकिन दूसरे हाफ में कई शानदार सीन है। मोनिशा और विवेक को एडिटिंग पर थोड़ा और ध्यान देना था। फिल्म के सभी गाने बिल्कुल सही तरह से रखे गए है। आजादियां और होली खेलें, सबसे ज्यादा पसंद की जाएगी।
फिल्म आराम से बैठ कर नहीं देख सकते, क्योंकि इसमें समाज का दोहरा चरित्र दिखाया गया है। हाँलाकि ये कंफर्ट भी देती है और सोचने पर मजबूर करती है कि सुबह कभी तो होगी। इस फिल्म को विद्या बालन के लिए देखिए जिनकी आखें और एक एक डायलोग आपके रोंगटे खड़े कर देगा।
विद्या बालन, ईला अरूण, नसीरउद्दीन शाह, चंकी पांडे, पल्लवी शारदा, मिष्टी, फ्लोरा सैनी, रिद्धिमा तिवारी, रजित कपूर, आशिष विद्यार्थी, विवेक मुश्रा के स्टारकास्ट वाली इस फिल्म के लेखक और निदेशक श्रीजीत मुखर्जी हैंl प्रोड्यूसर हैं मुकेश भट्ट और विशेष भट्टl


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