ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि काजियों’ को एक मशविरा जारी किया जायेगा कि वे दूल्हे से कहें कि वह तीन तलाक का अनुसरण नहीं करेंगे, साथ ही विवाह विच्छेद के लिये तीन तलाक का सहारा लेने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया जायेगा.
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक को शरियत में अथवा इस्लामिक कानून में ‘अवांछनीय परंपरा’ करार देते हुए कहा कि पति-पत्नी के बीच विवाद को परस्पर बातचीत के जरिये हल किया जाना चाहिए और इस संबंध में उसने शरियत के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुये एक आचार संहिता भी जारी की है. बोर्ड ने यह भी कहा कि वह अपनी वेबसाइट, इश्तेहारों और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को एडवाइजरी जारी करेगा और तीन तलाक के खिलाफ उन्हें अवेयर करेगा. बोर्ड काजियों को भी एडवायजरी जारी करेगा. बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में कहा कि तलाक देने के एक स्वरूप के रूप में तीन तलाक की परंपरा को हतोत्साहित करने के इरादे से फैसला किया गया है कि एक बार में तीन तलाक देने का रास्ता अपनाने वाले मुसलमानों का ‘सामाजिक बहिष्कार’ किया जाये और इस तरह के तलाक की घटनाओं को कम किया जाये.
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हलफनामे में यह भी कहा कि उसने 15-16 अप्रैल को अपनी कार्यसमिति की बैठक में तीन तलाक की परंपरा के खिलाफ एक प्रस्ताव भी पारित किया है. हलफनामे में यह भी कहा गया है कि तलाक के बारे में शरियत का रुख एकदम साफ है कि बगैर किसी वजह के तलाक देने की घोषणा करना और एक ही बार में तीन बार तलाक देना तलाक का सही तरीका नहीं है.
बोर्ड ने कहा है कि उसने अपनी वेबसाइट, प्रकाशनों और सोशल मीडिया के माध्यम से काजियों को यह मशविरा देने का निर्णय किया है कि निकाहनामा पर हस्ताक्षर करते समय दूल्हे से कहा जाये कि वे मतभेद होने की स्थिति में एक ही बार में तीन तलाक देने का रास्ता नहीं अपनायेगा क्योंकि शरियत में यह अवांछनीय परंपरा है. देश की बहुत सारी मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक का विरोध करती रही हैं. मुस्लिम महिलाओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में 7 पिटीशन्स दायर की गईं, जिनमें दावा किया गया है कि तीन तलाक अनकॉन्स्टिट्यूशनल है. इन पिटीशंस पर 11 मई से सुनवाई शुरू हुई थी. केस में केंद्र सरकार, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत-ए-इस्लामी हिंद और मुस्लिम स्कॉलर्स भी पक्षकार हैं.
केंद्र सरकार इसे ह्यूमन राइट्स से जुड़ा मुद्दा बताते हुए इसके सख्त खिलाफ है. मुस्लिम स्कॉलर्स कहते हैं कि कुरान में तीन तलाक का जिक्र नहीं है. पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत-ए-इस्लामी हिंद इसे मजहबी और आस्था का मसला बता रहे हैं. प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने छह दिन की दलीलों और जिरह के बाद 18 मई को कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है.

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