केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने स्पष्ट किया कि तीन तलाक के मुद्दे पर केंद्र की मोदी सरकार के रूख के पीछे भाजपा का कोई छिपा एजेंडा नहीं है। परन्तु आस्था के नाम पर महिलाओं के साथ भेदभाव कि गलत प्रथाएं स्वीकार्य नहीं है।

प्रसाद ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करार देने के ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि तीन तलाक पर केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामा संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है। यह प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और गरिमा प्रदान करता है। कोई भी भेदभावकारी प्रथा आस्था का हिस्सा नहीं बन सकती है। आस्था के अधिकारों का हम पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन इसके नाम पर गलत प्रथा को हम स्वीकार नहीं कर सकते।

कानून मंत्री ने कहा कि जब 12 से भी ज्यादा मुस्लिम बहुल देश तीन तलाक की प्रथा को नियंत्रित कर सकते हैं, तो सरकार का रुख शरीयत के खिलाफ है की दलील कैसे स्वीकार की जा सकती है। उन्होंने कहा कि तीन तलाक की पीड़ित तीन महिलाओं ने ही इसकी वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। अदालत के निर्देश पर सरकार ने केवल सुविचारित जवाब दाखिल किया है, जो देश के संविधान के मौलिक अधिकारों के अनुरूप है। भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। हम ऐसा माहौल नहीं रख सकते हैं जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं खुद को सिर्फ इसलिए असहाय महसूस करें क्योंकि वे किसी खास धर्म से ताल्लुक रखती हैं।

केंद्रीय मंत्री ने तीन तलाक को समान नागरिक संहिता से जोड़कर नहीं देखने की अपील करते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग अलग से विचार कर रहा है। इस प्रक्रिया में सभी पक्षकारों से राय ली जा रही है। हम चाहते भी हैं कि सभी पक्षकारों से व्यापक राय आए और इस मुद्दे पर गहन चर्चा हो।

उन्होंने कहा कि वक्त बदल रहा है और मुस्लिम महिलाओं समेत देश के सभी लोग विकास के समान सहभागी बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मुझे पक्का विश्वास है कि भारतीय मुसलमान देश के संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करके पूरी दुनिया के लिए रोल मॉडल बन सकते हैं।

 

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