बिहार मे शिक्षा चुनौतीयाँ एवं सम्भावनायें विषय पर बिहार समाज विज्ञान अकादमी पटना द्वारा आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन शनिवार को सम्पन्न हो गया.
ऑक्सफेम इंडिया एवं दलित विकास अभियान समिति द्वारा संचालित सम्मेलन के तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए दलित मानवाधिकार एक्टिविस्ट धर्मेन्द्र कुमार ने कहा कि शिक्षा में व्याप्त दोहरी शिक्षा नीति, जातिगत असमानता, भेदभाव और जाति आधारित शिक्षा समाप्ति के लिए रूढ़िवादी मानसिकता से ऊपर उठकर पेशागत कार्य को लेकर ठोस कार्यनीति बनानी होगी. समानता और न्याय के बग़ैर वंचित वर्गों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना एक बहुत बडी चुनौती हैं जिसे समुदाय के सहयोग से ही पूरा करना सम्भव है.
इन्होंने भेदभाव रहित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की वकालत करते हुए कहा कि महादलित बस्तियों में स्थापित विद्यायलो को सही ढ़ंग से संचालित ही नहीं किया गया. मर्जर के नाम पर उन्हें बन्द करने का कार्य दलितों को शिक्षा से दूर रखने की साजिश के तहत किया जा रहा है. बगैर किसी ठोस नीति के बिना किताबें दिये, बगैर परीक्षा लिए तथा बिना शिक्षक के स्कूलों का संचालन और फिर मर्जर किया जाना अनुचित है. वहीं केन्द्रीय विद्यालयों एवं नवोदय विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था देखी जाय तो स्पष्ट हैं कि 85 प्रतिशत को शिक्षा से बेदखल कर 15 प्रतिशत का शिक्षा पर एकाधिकार है, दखलकब्जा है.
लडकियों, अल्पसंख्यकों एवं वंचितों के लिए शिक्षा तब तक बेमानी रहेगी जब तक विद्यालयों में विषयवार शिक्षक नही रहेंगे और बच्चों को पुस्तकें उपलब्ध नहीं करायी जायेंगी. नो डिटेंशन पॉलिसी को समाप्त कर बच्चों की गरिमा से खेलवाड़ किया जा रहा है. समुदाय के सहयोग बिना संभव नही दिखता कि इन वर्गों के बच्चों को उचित शिक्षा मिल पायेगी.


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