अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी समिति द्वारा आजाद हिंद सरकार के संस्थापक महान स्वतन्त्रता सेनानी राजा महेंद्र प्रताप सिंह की 133वीं जयंती पर स्वतंत्रता सेनानियों को विशिष्ट सेवा सम्मान प्रदान किया जायेगा.
दो दिवसीय कार्यक्रम के अंतर्गत एक दिसम्बर को आर्य समाज मन्दिर, करौलबाग में जयंती तथा दो दिसम्बर को स्मारिका विमोचन एवं स्वतन्त्रता सेनानी सम्मान समारोह आयोजित है. स्मारिका के मुख्य संपादक नित्यानंद शर्मा, कार्यकारी संपादक पंकज उपाध्याय, संपादक प्रेम कुमार शुक्ला एवं कला संपादक चंदन तिवारी ने अथक प्रयास से काफी कम समय में शानदार स्मारिका तैयार करने में सफलता पाई है जिसके लिए ये सभी साधुवाद के पात्र हैं.
अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी समिति के अध्यक्ष एन आर मथाड, कार्यकारी अध्यक्ष रामा राव कुलकर्णी, महासचिव नित्यानंद शर्मा सहित इनकी पूरी टीम ने समारोह में भाग लेने पहुँचे वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानियों के आवास एवं भोजन की अच्छी व्यवस्था की है. देश के लगभग तमाम हिस्से से स्वतन्त्रता सेनानी पहुंचे हैं. पहले कार्यक्रम सिर्फ एकदिवसीय होना था, जिसे बाद में दो दिवसीय स्वरूप दे दिया गया, फिर भी सारी व्यवस्था सुव्यवस्थित ढ़ंग से की गयी है.
महान स्वतन्त्रता सेनानी राजा महेंद्र प्रताप सिंह ही अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी समिति के संस्थापक हैं. इन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों की दुखद स्थिति देखते हुए 1969-70 में केंद्र सरकार पर दबाव बनाया और उन्हें पेंशन दिलवाया था. 29 अप्रैल1979 को गोलोकवासी हुए राजाजी ने देश की प्रथम आजाद हिंद सरकार की स्थापना करते हुए अखंड भारत के प्रथम राष्ट्रपति के पद पर आसीन हुए थे. इन्होंने ही जापान में एग्जेक्युटिव बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना की थी. चीन की संसद में भाषण देने वाले पहले भारतीय राजा महेंद्र प्रताप सिंह को जापान ने मार्को पोलो और जर्मनी ने ऑर्डर ऑफ रेड ईगल की उपाधि से सम्मानित किया था. उन्होंने ही विश्व मैत्री संघ की स्थापना की थी जो बाद में UNO का आधार बना. वे जाति, वर्ग, रंग आदि में भेद को अन्याय, पाप और अत्याचार मानते थे. उन्होंने छुआछूत दूर करने के लिए दलितों के साथ भोजन किया, जो एक राजा होते हुए उस समय असामान्य घटना थी.
उन्होंने अपनी सारी संपत्ति देश और शिक्षा के लिए दान कर दी. काशी हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ विद्द्यालय, भारत में तकनीकी शिक्षा के प्रथम केन्द्र प्रेम महाविद्यालय वृन्दावन, कायस्थ पाठशाला आदि के लिए अपनी जमीन दान दी. वृन्दावन में 80 एकड़ में फैले अपने फल उद्यान को इन्होंने 1911 में आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश को दान कर दिया. जिसमें आर्य समाज द्वारा संचालित वृन्दावन गुरुकुल और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है.


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