आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संपन्न लोग जरूरतमंदों को आरक्षण का फायदा नहीं लेने देते, मलाईदार तबके को बाहर करने का इंतजाम करे सरकार

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संविधान पीठ ने तमाम राज्य सरकारों से कहा कि भविष्य में कभी भी आरक्षण की सीमा 50% से ज़्यादा नहीं कर सकते. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि आरक्षण का फायदा उन लोगों को नहीं मिल रहा है, जिन्हें सही मायने में इसकी जरूरत है. SC ने कहा कि आरक्षण का लाभ उन ‘महानुभावों’ के वारिसों को नहीं मिलना चाहिए जो 70 वर्षों से आरक्षण का लाभ उठाकर धनाढ्य की श्रेणी में आ चुके हैं. आंध्र प्रदेश के कुछ जिलों में अनुसूचित जनजातियों के लिए सौ फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है, हालांकि इसके तहत अब तक नौकरी पाए लोगों के हित को देखते हुए उन्हें नौकरी में बहाल रखने का आदेश भी दिया.
आरक्षण का लाभ सही मायने में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुँच पाने पर कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जातियों, जनजातियों और सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पुरानी सूची पर काम करते रहना किसी भी तरह से ठीक नहीं है. सरकार को अब ऐसी सूची को संशोधित करना चाहिए. क्योंकि 70 साल पहले जिन लोगों को इस सूची में रखा गया था उससे अब आरक्षण का असली लाभ उन लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है जिनको आज के समय में इसकी आवश्यकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आरक्षण केस के एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि सरकार को इन चीजों की फिर से समीक्षा करनी चाहिए, पुरानी सूची पर काम करते रहना किसी भी तरह से ठीक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लाभार्थियों की सूची को संशोधित करना चाहिए और सूची में अब ऐसे लोगों को रखना चाहिए जो जरूरतमंद हैं और जिनको आरक्षण की आवश्यकता है. क्योंकि अभी भी उसी वर्ग के बाकी लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है, पहले से लाभ ले रहे लोगों की वजह से ये लाभ नीचे के लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है. जिनको पहले लाभ मिल गया वो ही लाभ लिए जा रहे हैं बाकी उसके इंतजार में हैं. इस वजह से आरक्षित वर्ग के दूसरे लोगों में असंतोष व्याप्त हो रहा है.
जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस विनीत शरण, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि ऐसा नहीं है कि आरक्षण पाने वाले वर्ग की जो सूची बनी है वह पवित्र है और उसे छेड़ा नहीं जा सकता. आरक्षण का सिद्धांत ही जरूरतमंदों को लाभ पहुंचाना है. कोर्ट ने साल 2000 में दाखिल किए गए एक मामले की सुनवाई करते हुए तत्कालीन आंध्र प्रदेश के जनवरी 2000 के आदेश को मनमाना, अवैध, अविवेकी, असंवैधानिक और अनुमति नहीं है कहते हुए रद्द कर दिया. इसमें अनुसूचित क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों के पद के लिए अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को शत प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया था. संविधान पीठ ने 1992 के इंद्रा साहनी के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि शत प्रतिशत आरक्षण प्रदान करना “अनुचित” होगा. कोई कानून यह नहीं कहता है कि अनुसूचित क्षेत्रों में केवल आदिवासी शिक्षक ही पढ़ा सकते हैं. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि संस्थापक पिता ने कभी भी सभी सीटों के आरक्षण की परिकल्पना नहीं की है.
संविधान पीठ ने कहा कि आरक्षण का लाभ उन ‘महानुभावों’ के वारिसों को नहीं मिलना चाहिए जो 70 वर्षों से आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं. सरकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों की सूची फिर से बनावे. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के भीतर ही आपस में संघर्ष है कि पात्रता के लिए योग्यता क्या होनी चाहिए? सरकार का दायित्व है कि सूची में बदलाव करे, जैसा कि इंद्रा साहनी मामले में नौ सदस्यीय पीठ ने कहा था. आरक्षण प्रतिशत के साथ बिना छेड़छाड़ किए सूची में बदलाव किया जा सकता है, जिससे सही मायने में जरूरतमंदों को लाभ मिल सके न कि उनको जो सूची में शामिल होने के बाद से आरक्षण का लाभ उठाते हुए समाज की मुख्यधारा में आ चुके हैं.
पीठ ने कहा कि ऐसा देखने को मिला है कि राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में बनाए गए आयोग की रिपोर्ट में भी सूची में बदलाव की सिफारिश की गई है. आयोग ने सूची में किसी जाति, समुदाय व श्रेणी को जोड़ने या हटाने की सिफारिश की है. जहां ऐसी रिपोर्ट उपलब्ध है वहां राज्य सरकार मुस्तैदी दिखाकर तार्किक तरीके से इसे अंजाम दे.


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