पदोन्नति में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं : सुप्रीम कोर्ट

 83 


सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए कोटा या आरक्षण की मांग करना मौलिक अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी सेवा में कुछ समुदायों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न दिए जाने का आंकड़ा सामने लाए बिना राज्य सरकारों को ऐसे प्रावधान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. यह राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर करता है कि उन्हें प्रमोशन में आरक्षण देना है या नहीं?
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की बेंच ने उत्तराखंड सरकार की अपील पर यह फैसला सुनाते हुए कहा कि अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-ए) आरक्षण लागू करने की शक्ति जरूर देता है, लेकिन यह तभी हो सकता है जब राज्य सरकार यह मानती हो कि सरकारी सेवाओं में कुछ समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने को प्रतिबद्ध है, लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा इसको लेकर दावा करना मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं है और न ही इस संबंध में कोर्ट राज्य सरकार को कोई आदेश जारी कर सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा 2012 में दिया गया फैसला निष्प्रभावी हो गया, जिसमें विशेष समुदायों को कोटा प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को आदेश दिया गया था. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए क्वांटिटेटिव डेटा इकठ्ठा करने का निर्देश दिया था. जिसके जरिए यह पता लगाया जाना था कि सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं, ताकि प्रमोशन में आरक्षण दिया जा सके. इस फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
वर्ष 2018 में पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि ‘क्रीमी लेयर’ को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता. पिछले साल दिसंबर में केंद्र सरकार ने 7 न्यायाधीशों वाली पीठ से इसकी समीक्षा करने का अनुरोध भी किया था.


loading…

Loading…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *