अल्पसंख्यकों के लिए चल रही योजनायें हिंदुओं के साथ हैं भेदभाव; सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल

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अल्पसंख्यकों की कल्याणकारी योजनाओं के लिए पिछले बजट में दिए गये 4,700 करोड़ रुपये को हिंदुओं के साथ भेदभाव बताते हुए UP के 5 लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है.
केंद्र सरकार को 4 सप्ताह में इस याचिका पर जारी नोटिस का जवाब देना है. उधर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि इसे बड़ी बेंच को ट्रांसफर किया जाना चाहिए क्योंकि याचिका में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ऐक्ट, 1992 तथा संवैधानिक नियमों को भी चुनौती दी गई है.
अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि इस मामले को 5 सदस्यीय संवैधानिक बेंच को भेजा जाना चाहिए पर कोर्ट ने कहा कि फ़िलहाल वह इसे तीन सदस्यीय बेंच के पास भेजेगी. जहां से बाद में इसे और बड़े बेंच के पास भेजा जा सकता है.
याचिकाकर्ताओं के वकील विष्णु शंकर जैन ने अपनी दलील में कहा कि सरकार और संसद अल्पसंख्यकवाद को बढ़ावा नहीं दे सकते और केवल अल्पसंख्यकों के लिए लाभकारी योजनायें जारी नहीं कर सकते हैं. उन्होंने कोर्ट से कहा कि सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए स्कॉलरशिप, वक्फ तथा वक्फ की संपत्तियों को अनुचित लाभ जैसी योजनाएं विभेदकारी हैं. हिंदु समुदाय के मठों, ट्रस्टों और अखाड़ों के लिए ऐसी योजनाएं नहीं हैं, जो धर्मनिरपेक्षता की धारणा के खिलाफ है और समानता के अधिकार का उल्लंघन है.
याचिका में कहा गया है कि नोटिफाई किए गए अल्पसंख्यक समुदायों में कोई भी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा नहीं है, इसलिए सरकार और संसद का यह आदेश असंवैधानिक है.
याचिकाकर्ताओं ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ऐक्ट के तहत आने वाली कल्याणकारी योजनाओं में शामिल 14 स्कीमों का हवाला देते हुए कहा है कि इस लाभकारी योजनाओं का लाभ एक खास समुदाय को मिल रहा है जबकि ऐसी ही स्थिति से गुजर रहे दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को इन लाभों से वंचित रहना पड़ रहा है. याचिका में यह भी कहा गया है कि कोई राज्य अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदाय में भेदभाव नहीं कर सकता है. यह कोई ऐसे कानून नहीं बना सकते हैं, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों को एक अलग वर्ग बताता हो. केवल संविधान के आर्टिकल 30 के तहत ही ऐसे कानून बन सकते हैं.


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