स्वर साम्राज्ञी, स्वर कोकिला लता मंगेशकर मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में वेंटिलेटर पर हैं, उनकी हालत गंभीर बनी हुई है. उनके सलामती और जल्द स्वस्थ होने की दुआएं पुरे देश में मांगी जा रही हैं. छ: दशकों के कार्यकाल में बीस से ज्यादा भाषाओं में 30000 से अधिक फ़िल्मी और गैर-फ़िल्मी गाना गाने वाली लतादी एकमात्र ऐसी जीवित व्यक्ति हैं, जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं.
ब्रीच कैंडी के चिकित्सकों के अनुसार उन्‍हें निमोनिया होने के साथ ही बायां वेट्रिकुलर फेल हो चूका है. बायां वेट्रिकुलर ही हृदय को सबसे ज्‍यादा ऑक्‍सीजन देता है, शरीर के सामान्‍य तरीके से काम करने के लिए इसका ठीक रहना बहुत जरूरी है. उनकी हालत लगातार गंभीर ही बनी हुई है. 28 सितंबर को ही उनके 90वें जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सदी के नायक अमिताभ बच्चन और क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर समेत कई दिग्गजों और लाखों फैंस ने उन्हें बधाइयां दी थीं.
अपनी जादुई आवाज़ से पूरी दुनिया को अपना दीवाना बनाने वाली लता मंगेशकर ने अपने शुरूआती दौर में कुछ हिन्दी और मराठी फ़िल्मों में अभिनय भी किया है. अभिनेत्री के रूप में अपनी पहली फ़िल्म पाहिली मंगलागौर (1942) में उन्होंने स्नेहप्रभा प्रधान की छोटी बहन की भूमिका निभाई थी. बाद में उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें माझे बाल, चिमुकला संसार (1943), गजभाऊ (1944), बड़ी माँ (1945), जीवन यात्रा (1946), माँद (1948), छत्रपति शिवाजी (1952) शामिल हैं. लताजी ने आनंद घन बैनर तले फ़िल्मो का निर्माण भी किया है. उन्होंने 1947- 48 में जब पार्श्वगायिकी में कदम रखा था उस समय इस क्षेत्र में नूरजहां, अमीरबाई कर्नाटकी, शमशाद बेगम और राजकुमारी आदि की तूती बोलती थी.
लताजी ने अपना पहला गाना एक मराठी फिल्म ‘कीति हसाल’ के लिए गाया था जो रिलीज नहीं हो पायी. वसंत जोगलेकर ने 1947 में अपनी ‘आपकी सेवा में’ फ़िल्म में गाने का अवसर लताजी को दिया, फ़िल्म के गानों से लताजी को काफी वाहवाही मिली. इसके बाद फ़िल्म ‘मज़बूर’ के गानों “अंग्रेजी छोरा चला गया” और “दिल मेरा तोड़ा हाय मुझे कहीं का न छोड़ा तेरे प्यार ने” जैसे गानों और उसके बाद फ़िल्म “महल” में उस समय की सबसे खूबसूरत और चर्चित अभिनेत्री मधुबाला पर फिल्माए गये “आयेगा आनेवाला” गीत (1949) के बाद लताजी को पीछे मुड़कर देखने का अवसर ही नहीं मिला. वो हमेशा नंगे पाँव गाना गाती रही हैं. हाँलाकि उन्होंने 1980 के बाद फ़िल्मो में गाना काफी कम कर दिया हाँ स्टेज शो करती रहीं.

भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” 2001 में प्राप्त करने वाली लतादी का 1959 से 1971 तक फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका पुरस्कार पर लगभग एकाधिकार रहा था. वो एकमात्र जीवित व्यक्ति हैं, जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं. “लता मंगेशकर पुरस्कार” एक राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार है जो संगीत के क्षेत्र में काम करने के लिए दिया जाता है. मध्यप्रदेश सरकार ने 1984 में यह पुरस्कार शुरू किया. महाराष्ट्र सरकार ने भी 1992 से लता मंगेशकर पुरस्कार देना शुरू किया, बाद में आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा भी इसी नाम से एक पुरस्कार देना शुरू किया. लतादी की जादुई आवाज़ के दीवाने पूरी दुनिया में हैं. टाईम पत्रिका ने उन्हें भारतीय पार्श्वगायन की अपरिहार्य और एकछत्र साम्राज्ञी बताया था.
1969 में पद्म भूषण और 1999 में पद्म विभूषण से सम्मानित लतादी का नाम 1974 में ही दुनिया में सबसे ज्यादा गीत गाने वाले के रूप में गिनीज़ बुक रिकॉर्ड में दर्ज़ हो चूका था. 1989 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार तथा 1993 में उन्हें फिल्म फेयर का लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार, 1996 में स्क्रीन का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार,1999 में ज़ी सिने का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार, 2000 में IIAF का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार और 2001 में स्टारडस्ट का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार मिल चूका है. 1997 में राजीव गान्धी पुरस्कार, 1999 में NTR पुरस्कार, 2001में नूरजहाँ पुरस्कार और 2001 में महाराष्ट्र भूषण प्राप्त करने वाली लता मंगेशकर ने 1958, 1962, 1965, 1969, 1993 और 1994 में फिल्म फेयर पुरस्कार, 1972, 1975 और 1990 में राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 1966 व 1967 में महाराष्ट्र सरकार पुरस्कार प्राप्त लतादी की ख्याति पूरी दुनिया में है.
इंदौर में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के मध्यवर्गीय परिवार में 28 सितंबर 1929 को जन्मी लता मंगेशकर अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर और बहनों उषा मंगेशकर, मीना मंगेशकर और आशा भोंसले सबसे बड़ी हैं. सभी भाई- बहन ने संगीत को ही अपनी आजीविका का माध्यम बनाया. इनके पिता स्वयं रंगमंच के कलाकार और शास्त्रीय गायक थे. जन्म इंदौर में होने के बावजूद इनकी परवरिश महाराष्ट्र मे हुई. वह बचपन से ही गायक बनना चाहती थीं. मात्र 13 वर्ष की उम्र में पिता का साया (1942) इनके सर से उठ गया. संघर्ष के उन दिनों में पैसों की आवश्यकता के कारण पसंद नहीं होते हुए भी इन्हें कुछ हिन्दी और मराठी फ़िल्मों में काम करना पड़ा था.


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