भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घरेलू देशी उद्योगों के हित में एक बड़ा फैसला लेते हुए क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) में शामिल होने से इंकार कर दिया. RCEP शिखर सम्मेलन में PM ने भाग तो लिया पर भारत के हितों के साथ समझौता करने को तैयार नहीं हुए.
RCEP समझौता दस आसियान देशों और 6 अन्य देशों ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया के बीच का एक मुक्त व्यापार समझौता है. RCEP के इन 16 सदस्य देशों में दुनिया की आधी आबादी रहती है और इनकी GDP पूरी दुनिया की GDP की एक-तिहाई है. इस समझौते में वस्तुओं व सेवाओं का आयात-निर्यात, निवेश और बौद्धिक संपदा आदि शामिल हैं. इसमें शामिल देश एक-दूसरे को व्यापार में टैक्स कटौती सहित तमाम आर्थिक छूट देने वाले हैं. RCEP के 16 सदस्य देशों की जीडीपी पूरी दुनिया की जीडीपी का एक-तिहाई है और दुनिया की आधी आबादी इसमें शामिल है. इस समझौते में वस्तुओं व सेवाओं का आयात-निर्यात, निवेश और बौद्धिक संपदा जैसे विषय शामिल हैं.
अमेरिका के साथ चल रहे ट्रेड वॉर के कारण चीन को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है, फिलहाल चीन RCEP समझौते को अविलम्ब चाहता है. भारत अगर RCEP समझौता करता तो जापान और दक्षिण कोरिया से आने वाली 90%, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और चीन से आने वाले 74% सामान को टैरिफ से मुक्त करना पड़ता. भारतीय बाजार चाइनीज सामान से भर जाते. ये पूरी स्थिति भारत के लिए आत्मघाती होती. भारत के RCEP पर हस्ताक्षर करते ही चीन समेत अन्य देश अपने सामानों से भारत की छोटी- छोटी कंपनियों को बर्बाद कर देते. वैसे RCEP समझौता चीन के लिए एक बहुत बड़े अवसर की तरह है क्योंकि उत्पादन के मामले में बाकी कोई देश उसके आगे कहीं नहीं टिकते. चीन इस समझौते के जरिए अपने आर्थिक दबदबे को कायम करने की फ़िराक में हैं.
भारत के इस रुख को पूरी दुनिया में PM मोदी के मजबूत नेतृत्व और दुनिया में भारत के बढ़ते कद के रूप में देखा जाने लगा है. मोदी का यह रुख भारत के गरीबों के हितों की रक्षा करने वाला माना जा रहा है, जिससे यहाँ के किसानों, लघु उद्योगों और डेयरी क्षेत्र को बहुत मदद मिलेगी. RCEP में बोलते हुए PM मोदी ने कहा कि भारत प्रारंभ से ही RCEP वार्ता में सक्रिय, रचनात्मक और सार्थक रूप से लगा हुआ है. आज जब हम RCEP वार्ता के सात वर्षों के दौरान देखते हैं, तो वैश्विक आर्थिक और व्यापार परिदृश्य सहित कई चीजें बदल गई हैं, जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते. समझौते का मौजूदा स्वरूप इसकी बुनियादी भावना और मान्य मार्गदर्शक सिद्धांतों को पूरी तरह जाहिर नहीं करती न ही मौजूदा परिस्थिति में भारत के दीर्घकालिक मुद्दों और चिंताओं का संतोषजनक रूप से समाधान ही पेश करता है. ऐसी स्थिति में, भारत के लिए RCEP समझौते में शामिल होना संभव नहीं है.
ज्ञात है कि भारत ने 2010 में ASEAN और दक्षिण कोरिया के साथ और 2011 में मलेशिया व जापान के साथ FTA पर हस्ताक्षर किए थे. UPA के दौरान भारत ने आसियान देशों में अपना बाजार 74% खोला उधर इंडोनेशिया जैसे अमीर देशों ने भारत के लिए केवल 50% खोला. इन निर्णयों के प्रभाव के कारण भारत का व्यापार घाटा RCEP राष्ट्रों के साथ 2004 में 7 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2014 में 78 बिलियन डॉलर हो गया. UPA सरकार ने ही 2007 में भारत-चीन FTA का पता लगाने और 2011-12 में चीन के साथ RCEP वार्ता में शामिल होने के लिए सहमत हो गयी थी.


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