भारत और जापान ने अपने विदेश और रक्षा मंत्रियों के पहले 2+2 डायलॉग में पाकिस्तान में संचालित आतंकी नेटवर्क को क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा बताते हुए पाकिस्तान से दो टूक शब्दों में कहा कि वह अपने यहां के आतंकी नेटवर्क के विरुद्ध ठोस और निर्णायक कारवायी सुनिश्चित करे. इसके पूर्व जापान ने कहा कि वह भारत की भागीदारी के बगैर आरसेप में शामिल नहीं होगा.
जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी और रक्षा मंत्री तारो कोनो ने भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा करने के बाद साझा बयान में आतंकवाद के बढ़ते खतरे की निंदा की. दोनों देशों ने पाकिस्तान से चल रहे आतंकी नेटवर्क को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए ऐसे तमाम संगठनों के खिलाफ कड़ी कारवायी करने की आवश्यकता बताई. साथ ही आतंकवाद और हिंसक चरमपंथ का मुकाबला करने के लिए मजबूत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सूचना और खुफिया जानकारी की साझेदारी पर बल दिया. दोनों देश अपने नियंत्रण वाले सभी क्षेत्रों में किसी भी अन्य देश में आतंकवाद फैलाने वाले समूहों पर नियंत्रण करने तथा आतंक के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देने पर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष अक्टूबर में आयोजित 13वें भारत-जापान वार्षिक सम्मेलन में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए 2+2 वाली रूपरेखा तय की थी. दोनों देशों ने पाकिस्तान से आंतकवाद से निपटने को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से किए वादों पर खरा उतरने को कहा जिसमें वैश्विक आतंक रोधी संस्था ‘फाइनैंशल ऐक्शन टास्क फोर्स’ (FATF) के सुझाव भी शामिल हैं.
दोनों देशों ने दुनिया के अन्य सभी देशों से कहा कि वो अपने यहां आतंकवादियों का पनाहगाह विकसित न होने दें. अंतराष्ट्रीय समुदाय आतंकवादियों के इन्फ्रस्ट्राक्चर, उनके नेटवर्क्स, उनके फंडिंग चैनल्स को ध्वस्त करने के साथ-साथ आतंकवादियों की सीमा पार गतिविधियों पर रोक लगाने का कार्य करें. दोनों देशों के ने आतंकवाद के बढ़ते खतरे की कड़े शब्दों में आलोचना की और माना कि यह क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है.
जापानी विदेश मंत्री और जापानी रक्षा मंत्री शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिले. इस दौरान PM मोदी ने मुलाकात कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, समृद्धि और स्थिरता की मुख्य चाभी भारत-जापान के संबंध हैं. साथ ही यह भारत के एक्ट ईस्ट पॉलिसी के लिए भी महत्वपूर्ण है. भारत अब तक दो देशों के साथ 2+2 वार्ता में शामिल रहा है. अमेरिका और भारत मंत्री स्तर पर 2+2 बैठक में शामिल होते हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया के साथ सिर्फ पदाधिकारी स्तर पर 2+2 बातचीत होती है. भारत और अमेरिका के बीच 2+2 स्तर की वार्ता 18 दिसंबर को वॉशिंगटन में होनी है.
इसके पूर्व रीजनल कॉम्प्रहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसेप) मुद्दे पर भारत को जापान का साथ तब मिला जब जापान ने साफ तौर पर कह दिया कि वह भारत की भागीदारी के बगैर आरसेप में शामिल नहीं होगा. जापान ने कहा कि वह आरसेप का हिस्सा तभी बनेगा, जब इसमें शामिल देश भारत की चिंताओं का ख्याल रखते हुए उसे समझौते का हिस्सा बनाएंगे. जापान की यह घोषणा भारत के आर्थिक हितों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है. भारत सरकार द्वारा कई दौर की वार्ता के बाद चीन की अगुआई वाले इस समझौते से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहते हुए आरसेप से अलग हो गये थे कि इसमें भारतीय हितों का ख्याल नहीं रखा गया है. हमारे छोटे उद्योगों और कृषि क्षेत्र को नुकसान उठाना पड़ सकता है.
भारत द्वारा आरसेप से अलग होने के फैसले के बाद चीन ने कहा था कि भारत के बिना बाकी के 15 देश इस समझौते पर आगे बढ़ेंगे और भविष्य में भारत के लिए आरसेप के द्वार खुले रहेंगे. भारत और जापान एशिया की दो बड़ी आर्थिक शक्तियां हैं, इन दोनों के आरसेप से बाहर रहने की स्थिति में इस समझौते की सफलता पर ही सवाल उठने शुरू हो जाने की संभावना है. आरसेप एक प्रस्तावित क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौता है. जिसमें 10 आशियान देशों के साथ ही चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया के शामिल होने की बात है. जिसकी शुरुआत 2012 में कंबोडिया में आयोजित आसियान देशों की बैठक में हुई थी. यह समझौता अगर वास्तव में मूर्त रूप ले लेता है तो इसके अंतर्गत दुनिया की लगभग आधी आबादी और 39% GDP आ जाएगा.


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