कोरोना के 150 वैक्सीन पर दुनिया में हो रहा काम, भारत है सबसे आगे

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कोरोना संक्रमण (COVID-19) का घातक प्रकोप दुनियाभर में जारी है और अभीतक दुनिया में एक करोड़ 68 लाख लोग संक्रमित पाए गए हैं जबकि छह लाख 60 हजार से अधिक लोग अपनी जान गँवा चुके हैं. यही कारण है कि दुनिया में लगभग 150 स्थानों पर इस वायरस के वैक्सीन पर काम चल रहा है. दुनिया इस मुद्दे पर एकजुट नजर आ रही है. कुछ वैक्सीन के काफी अच्छे नतीजे भी सामने आये हैं. इनमें मॉडर्ना (Moderna), ऑक्सफोर्ड (Oxford), फाइजर (Pfizer) एवं भारत बायोटेक (Bharat Biotech) चार वैक्सीन काफी आगे हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि 2020 में ही कोरोना वैक्सीन आ जाएगी.
दुनियाभर में COVID-19 के वैक्सीन पर चल रहे 150 प्रयासों में लगभग 140 अभी शुरुआती दौर में हैं जबकि कई तीसरे स्टेज के ट्रायल तक पहुँच चुकी हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की चीफ़ साइंटिस्ट सौम्या विश्वनाथन ने मई के महीने में ही ऑक्सफोर्ड के कोविड वैक्सीन को सबसे एडवांस कहा था. इंग्लैंड में अप्रैल के दौरान इस वैक्सीन प्रोजेक्ट के पहले और दूसरे चरण के ट्रायल का काम एक साथ पूरा हुआ था.
ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी यह वैक्सीन AstraZeneca कंपनी के साथ मिलकर बना रही है, जिसके तीसरे फेज का ट्रायल ब्राजील और साउथ अफ्रीका में शुरू हो गया है. भारत की सीरम कंपनी के साथ इसके प्रोडक्शन समझौता है. माना जा रहा है कि इस वैक्सीन की इमरजेंसी डोज अक्टूबर तक तैयार हो सकती है. भारतीय कंपनी सीरम इन्हें कोविडशील्ड नाम से बेचेगी और अपनी बनायी कुल खुराक का आधा हिस्सा भारत में ही देगी. अमेरिका, ब्रिटेन एवं यूरोपियन यूनियन के कई देशों ने वैक्सीन की बुकिंग कर रखी है.
अमेरिका की मॉडर्ना कंपनी की वैक्सीन का फाइनल और आखिरी ट्रायल चल रहा है, जो 30 हजार लोगों को दी जाएगी. मॉडर्ना वैक्सीन के बारे में दावा किया जा रहा है कि इस साल के आखिर तक यह तैयार हो जाएगी. कंपनी अमेरिका के नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ के साथ मिलकर काम कर रही है. कंपनी को अमेरिका से एक बिलियन डॉलर (सात हजार करोड़ रुपये) सहायता मिली है.
भारत बायोटेक और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) मिलकर भी कोरोना का एक वैक्सीन बना चुके हैं, जिसे कोवैक्सीन नाम दिया गया है. इसके पहले और दूसरे फेज के ट्रायल चल रहे हैं. पहले इसके 15 अगस्त तक आने की बात कही गई थी लेकिन अब वर्ष के अंत में आने की बात कही जा रही है. भारत में दूसरा वैक्सीन प्रोजेक्ट ज़ाइडस कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड का भी चल रहा है.
एक दूसरी अमेरिकी कंपनी फाइजर भी फाइनल स्टेज में पहुंच चुकी है और तीसरे फेज़ का ट्रायल 30 हजार लोगों पर शुरू करने जा रही है. इसे Pfizer और BioNTech मिलकर बना रहे हैं. कम्पनी का भी दावा है कि साल के आखिर तक वैक्सीन तैयार हो जाएगी. कंपनी के साथ अमेरिकी सरकार ने दस करोड़ डोज देने का करार दो अरब डॉलर (15 हजार करोड़ रुपये) में कर लिया है.
चीन की प्राइवेट फार्मा कंपनी कंपनी सिनोफॉर्म (Sinopharm) के अनुसार उसने तीसरे फेज का ट्रायल शुरू कर दिया है. इसे भी CoronaVac के नाम से साल के अंत तक बाज़ार में लॉन्च किया जा सकता है. मॉडर्ना और ऑक्सफोर्ड के बाद ट्रायल के अंतिम चरण में पहुँचने वाला इसे दुनिया का तीसरा वैक्सीन माना जा रहा है. वर्ष 2002-2003 के बीच जब सार्स महामारी फैली थी तब सिनोवैक ने उसके वैक्सीन पर काम शुरू किया था लेकिन महामारी के अचानक ख़त्म हो जाने पर कंपनी ने वैक्सीन प्रोजेक्ट बंद कर दिया था. 17 साल बाद कंपनी अपने पुराने रिसर्च को वहीं से फिर शुरू किया है क्योंकि कोविड-19 सार्स महामारी से काफ़ी मिलती-जुलती मानी जा रही है.
हांलाकि इसके पूर्व दुनिया में मम्प्स नामक बीमारी के लिए सबसे तेज़ 4 वर्ष में वैक्सीन खोजा था. लेकिन COVID-19 महामारी जिस तेज़ी से फैली है उसके मद्देनजर इसकी वैक्सीन खोजने का काम ऐतिहासिक गति से चल रहा है. उधर ग्लोबल वैक्सीन अलायंस भी तैयार हो जाने के बाद वैक्सीन को पूरे विश्व में बांटने और इसकी कीमत तय करने में अभी से लग गयी है. अलायंस का मानना है कि इसकी अधिकतम कीमत 3000 रुपये (40 डॉलर) हो सकती है.



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