गरीब महिलाओं के चेहरे पर खुशी लाने के लिए शुरू की गई उज्ज्वला की रसोई अब सांस को भी सेहतमंद करने लगी है। वर्ष 2016 में 2.05 लाख मरीजों की रोग विवरण रिपोर्ट पर इंडियन चेस्ट सोसाइटी ने दो साल पड़ताल के बाद यह पाया है कि जिस रसोई में एलपीजी पहुंची है, वहां श्वांस रोग और अन्य बीमारियां 20 फीसद तक घटी हैं। यह रिपोर्ट इंडियन चेस्ट सोसाइटी, चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन और फेफड़ा रोग विशेषज्ञों की टीम ने तैयार की है।
चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक व इंडियन चेस्ट सोसाइटी के उपाध्यक्ष डॉ. संदीप साल्वी के मुताबिक वर्ष 2016 में 880 शहर व कस्बों में 13,500 डॉक्टरों ने ओपीडी में आए 2.05 लाख रोगियों के मर्ज के आधार पर वर्गीकरण किया था। इस बीच, नौ मई 2016 को उज्ज्वला योजना लागू हुई तो इन्हीं रोगियों का क्षेत्रवार व एलपीजी प्रयोग के आधार पर विश्लेषण किया गया। जहां एलपीजी का प्रयोग कम है, वहां श्वांस रोगी ढाई गुना अधिक मिले। लकड़ी, कोयला, कंडा आदि का प्रयोग करने वाले घरों में महिलाएं व 18 वर्ष से छोटे बच्चे (खासकर पांच साल से कम) कार्बन के ऑक्साइड और पर्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5 व पीएम 10) समेत अन्य हानिकारक गैसों की चपेट में पाए गए। उनके फेफड़े और सांस की नली कमजोर मिली। 18 साल से कम उम्र के 36,476 बच्चे व किशोर भी श्वांस रोगी पाए गए।
सोसाइटी के अध्यक्ष व मुरारी लाल चेस्ट हॉस्पिटल के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सुधीर चौधरी के मुताबिक, महिलाओं व बच्चों की काउंसिलिंग के आधार पर रिपोर्ट बनाई गई है। कुकिंग गैस का प्रयोग करने वाले घरों में महिलाओं व बच्चों में सांस रोग घटा है। यहां नए श्वांस रोगी नहीं मिले हैं।
किंग्स जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के रेस्पिरेटरी मेडिसिन के विभागाध्यक्ष व टीबी टोबैको एंड पॉल्यूशन फ्री कैंपेन के संयोजक डॉ. सूर्यकांत के मुताबिक, ग्रामीण महिलाएं औसतन सात-आठ घंटे रसोई में बिता रही हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चे भी साथ रहते हैं। इन बच्चों के फेफड़े गुलाबी से काले हो गए हैं। जहां एलपीजी मिली है, श्वांस रोगी 20 फीसद तक घटे हैं।
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