फांसी के मामले में अंतहीन मुकदमेबाजी की इजाजत नहीं : सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा के मामले में कहा कि फांसी की सजा प्राप्त दोषी को यह नहीं समझना चाहिए कि वह इस पर कभी भी सवाल उठा सकता है. हम समाज के लिए न्याय करते हैं. उन्हें अंतहीन मुकदमेबाजी की इजाजत नहीं दी जा सकती. हम दोषी ठहराए जा चुके अपराधी को माफ नहीं कर सकते.
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने ये टिप्पणी फांसी की सजा पाए अमरोहा कांड के दोषी शबनम और सलीम की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान की. पीठ में जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस संजीव खन्ना शामिल थे. पीठ ने दोषियों की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ की यह टिप्पणी दिल्ली दुष्कर्म कांड के चारों दोषियों की फांसी टालने के लिए अपनाए जा रहे रवैये के मद्देनजर काफी महत्वपूर्ण है. अदालत उन्हें फांसी देने के लिए एक फरवरी की तिथि तय कर चुकी है लेकिन दोषी फांसी को लटकाने और उसमें देरी करने के लिए एक- एक कर अर्जी दाखिल कर रहे हैं. कुख्यात रंगा- बिल्ला, उजागर-करतार सिंह, मकबूल भट्ट समेत कई अन्य मामलों में भी फांसी को टालने के लिए अलग- अलग तरीके अपनाये जाते रहे हैं.
अमरोहा (उत्तर प्रदेश) के बावनखेड़ी गांव की रहने वाली शबनम ने 15 अप्रैल 2008 को प्रेमी सलीम के साथ मिल कर अपने माता- पिता सहित परिवार के कुल सात लोगों की हत्या कर दी थी. मारे गए लोगों में दस महीने का एक बच्चा तक शामिल था. निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने शबनम और सलीम को फांसी की सजा सुनाई है. शबनम मौत की सजा पाने वाली पहली महिला है. दोनों द्वारा पुनर्विचार याचिका दाखिल कर फांसी माफ करने की गुहार लगाने के बाद हुयी सुनवाई में दोषियों के वकील ने गरीबी और जेल में उनके अच्छे आचरण का हवाला देते हुए फांसी की सजा माफ करने की अपील की. उनके वकील ने कहा कि कोर्ट को शबनम के जेल में व्यवहार को देखते हुए उसमे सुधार होने की गुंजाइश और उसके बच्चे के मद्देनजर मौत की सजा माफ की जानी चाहिए. वह जेल के स्कूल में पढ़ाती है तथा सामाजिक कार्यक्रमों में भी शामिल होती है.
इन दलीलों पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद दोषी का जेल का व्यवहार पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के लिए कैसे महत्वपूर्ण हो सकता है? क्या इससे दस महीने के बच्चे की हत्या का जुर्म खत्म हो गया? कोर्ट कानून के मुताबिक चलता है और कानून अपराधी के लिए होता है. कोर्ट माफी के मुद्दे पर विचार नहीं कर रहा, न्यायाधीश के पास अपराधी को माफ करने का अधिकार नहीं होता. न्यायाधीश पीडि़त और समाज को न्याय देने के लिए है. हम ऐसे मामले में दोषी के अधिकारों पर फोकस नहीं देना चाहते, जिसमें 10 महीने के बच्चे सहित सात लोगों की हत्या की गई.
सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह तो उसी तरह की बात है कि मां- बाप को मारने वाला अनाथ होने की दुहाई देकर दया की भीख मांगे. कोर्ट ने हर पहलू पर विचार करने के बाद मौत की सजा दी थी और उसे रद्द करने का कोई कारण नहीं है. साथ ही तुषार मेहता ने इसी के साथ गृह मंत्रालय द्वारा दाखिल की गई अर्जी का जिक्र करते हुए कोर्ट से कहा कि वो फांसी के मामले में टाइम लाइन तय करे. कोर्ट समाज और पीडि़त को ध्यान में रखते हुए दिशानिर्देश जारी करे.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2013 में शबनम और सलीम को मौत की सजा देने के सेशन कोर्ट के 2010 के फैसले को सही ठहराया था. शीर्ष अदालत ने भी इस अपराध के लिए 15 मई 2015 को दोनों की सजा बरकरार रखी थी. अपनी सजा के खिलाफ पुनर्विचार याचिका और राष्ट्रपति को क्षमा याचना अर्जी देने की मांग पर 2015 में ही सुप्रीम कोर्ट ने दोनों के डेथ वारंट पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने कहा था कि दोषी को तब तक फांसी नहीं दी जा सकती जब तक वो अपने सारे कानूनी उपाय पूरे ना कर लें. शबनम ने राष्ट्रपति से सज़ा माफ़ी की गुहार की. घटना की विभत्सता देखते हुए वहां से भी शबनम की सज़ा न माफ़ हुई न कम हुई. माफ़ी याचना पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा अस्वीकार कर दी गई थी. उसके बाद यह रिव्यू पिटिशन दाखिल की गयी थी.


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