CBI को जागीर समझने और गुटबाजी करनेवाले निदेशक आम आदमी के साथ क्या करते होंगे?

 82 



CVC की रिपोर्ट पर CBI चीफ आलोक वर्मा के जवाब के कुछ अंश लीक होने से नाराज प्रधान न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान आलोक वर्मा के वकील फली नरीमन से पूछा कि हमने ये रिपोर्ट आपको वर्मा के वकील के तौर पर नहीं बल्कि एक वरिष्ठ वकील के तौर पर दी थी, ये पेपर बाहर कैसे आ गए. कोर्ट ने सुनवाई 29 नवंबर तक के लिए टाल भी दी. सवाल उठता है कि CBI को अपनी जागीर समझ वहाँ गुटबाजी करनेवाले पदाधिकारी आम आदमी के साथ क्या करते होंगे?
दरअसल इस रिपोर्ट के कुछ अंश मीडिया में आयीं थी इससे नाराज प्रधान न्यायाधीश सवाल पर नरीमन ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और जानकारी नहीं होने की बात कहने के साथ ही कहा कि रिपोर्ट लीक करने वालों को कोर्ट में हाजिर कराया जाना चाहिए. इस जवाब से अत्यधिक नाराज प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि आप में से कोई सुनवाई के लायक ही नहीं है.
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष वर्मा के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने जवाब दाखिल करने के लिये सोमवार की सुबह जब थोड़ा वक्त देने का अनुरोध किया तो न्यायालय ने मंगलवार को सुनवाई का कार्यक्रम स्थगित करने से इनकार करते हुए कहा था कि इस मामले की सुनवाई के निर्धारित कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया जायेगा. इसी के बाद आलोक वर्मा ने अपने उपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर केन्द्रीय सतर्कता आयोग की प्रारंभिक रिपोर्ट पर सोमवार को अपराह्न सीलबंद लिफाफे में अपना जवाब न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को अपराह्न एक बजे सौंप दिया था.
इससे पहले शीर्ष अदालत ने CBI निदेशक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर CVC की प्रारंभिक रिपोर्ट पर 16 नवंबर को आलोक वर्मा को सीलबंद लिफाफे में सोमवार तक जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए कहा था कि CVC ने अपनी जांच रिपोर्ट में कुछ ‘बहुत ही प्रतिकूल’ टिप्पणियां की हैं और वह कुछ आरोपों की आगे जांच करना- कराना चाहता है. न्यायालय ने CBI निदेशक आलोक वर्मा को सभी अधिकार वापस देने और उन्हें अवकाश पर भेजने के सरकारी फैसले को चुनौती देने वाली वर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी .


इसके पूर्व (16 नवंबर) CVC द्वारा आलोक वर्मा को क्लीन चिट मिलने की खबरों से मीडिया रिपोर्ट्स भरी पड़ी थीं. समझा जा रहा था कि वर्मा कोर्ट में सरकार की फजीहत करा देंगे और पुनः CBI मुख्यालय में वापस लौट आएंगे. परन्तु 16 नवंबर के बाद इन सबका तब पटाक्षेप हो गया जब सुप्रीम कोर्ट ने CVC की रिपोर्ट की समीक्षा के दौरान खुलासा किया कि रिपोर्ट से सामने आई कुछ बातें वर्मा के लिए ‘काफी असामान्य’ हैं. इसके बाद पूरी कहानी नाटकीय तरीके से बदल गई और माना जाने लगा कि एक प्रकार से वर्मा की किस्मत का फैसला हो गया.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी आए पर आलोक वर्मा ने सार्वजनिक भरोसे वाली एक संस्था CBI को चलाने का नैतिक अधिकार तो खो ही दिया. देश की संघीय जांच एजेंसी के प्रमुख के रूप में उनकी जिम्मेदारी थी कि संस्था की अखंडता सुरक्षित रहे, मगर उन्होंने इसके विपरीत काम करते हुए संस्थान की छवि पर कीचड़ उछालने का काम किया. CBI निदेशक की ही जिम्मेदारी है कि वो संस्थान के सम्मान और निष्ठा को बनाए रखे.
इसके लिए अस्थाना भी उतने ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि संस्था में काम करने वाले हर किसी कर्मचारी की जिम्मेवारी है कि अपने संस्था की प्रामाणिकता बरकरार रखे. साथ ही किसी भी संस्था के प्रमुख और अन्य कर्मचारियों में फर्क भी होता है. वैसे भी CBI निदेशक को दो वर्ष के कार्यकाल का ‘सुरक्षा कवच’ प्राप्त है अन्य पदाधिकारी या कर्मचारी को नहीं.
CBI के दो वरिष्टतम पदाधिकारी जो एक दूसरे को ‘सबक सिखाने’ पर तुले होने के बावजूद कायदे से आरोप तक नहीं लगा पा रहे हैं, यह प्रमाणित करता है कि संस्थान में कार्य कुशलता और कार्य संस्कृति का घोर आभाव है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि निदेशक और विशेष निदेशक दोनों ही CBI को अपनी जागीर बनाने और संस्थान में गुटबाजी करने में व्यस्त रहे हैं. अंत में एक बात और कि अगर निदेशक और स्पेशल निदेशक आपसी लड़ाई में इस हद तक जा सकते हैं, तो वो एक आम आदमी के साथ क्या करेंगे या करते होंगे?

हर ताज़ा अपडेट पाने के लिए Pileekhabar के Facebook पेज को लाइक करें

loading...


Loading...



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *