बिहार को जल्द ही दो DGP मिल सकते हैं. प्रदेश में लगातार गिरती कानून व्यवस्था को चुस्त- दुरुस्त करने के लिए उपर से नीचे तक प्रयास शुरू कर दिए गये हैं. इसी कड़ी में पुलिस महानिदेशक “विधि व्यवस्था” एवं पुलिस महानिदेशक “प्रसाषन” दो पद होंगे.
सूत्रों की मानें तो बहुत जल्द अपर पुलिस महानिदेशक (प्रशिक्षण) दिनेश कुमार विष्ट पुलिस महानिदेशक (प्रसाषन) के रूप में अपनी सेवा राज्य को देते मिलेंगे. राज्य सरकार पुलिस की निगेटिव छवि को बदलने की कवायद में पूरी तरह जुट गई है. आरक्षी अधीक्षक और थाना प्रभारी इस दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं. प्रदेश के कुल 40 पुलिस जिलों में 1050 थाने है.
थाना प्रभारी के रूप में साफ सुथरी छवि वालों को जब तक नहीं बैठाया जायेगा लॉ एण्ड आर्डर की व्यवस्था को धारदार बनाना असम्भव है. इस संदर्भ में पूर्व DGP डीएन गौतम का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि “SP को ही थाना प्रभारी के दागी होने और नहीं होने का सर्टिफिकेट देना होता है और मेरा व्यक्तिगत अनुभव है की एक ईमानदार थाना प्रभारी को इसलिए सस्पेंड कर दिया गया क्योंकि वो ईमानदार था, अपने उच्चाधिकारी को चढ़ावा नही चढ़ाता था.”
थानों की खराब व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करना और लॉ एण्ड आर्डर की व्यवस्था को धारदार बनाने में इस ओर ध्यान देने की भी आवश्यकता है. 1987 में रोहतास जिले में 65 से अधिक ईनामी अपराधी थे, जिनमें कई पर एक लाख रूपये तक का ईनाम था. एक SP सुदर्शन सिंह वहाँ भेजे गये और मात्र 6 माह में रोहतास ईनामी अपराधी विहीन हो गया. ऐसा क्यों और कैसे हुआ? इसपर ध्यान देना होगा.


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