ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) कुद्स फोर्स के प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी और इराकी मिलिशिया कमांडर अबू महदी अल-मुहांडिस समेत 8 लोग इराक की राजधानी बगदाद में अमेरिकी हवाई हमले में मारे गए.
ईरान के खमेनी ने सुलेमानी की मौत के बाद तीन दिन के शोक की घोषणा की है. तय है कि इसके बाद मध्य पूर्व में एक नया मोड़ आएगा और ईरान और सैन्य बलों द्वारा इजरायल और अमेरिकी हितों के खिलाफ मध्य पूर्व में गंभीर जवाबी कार्रवाई हो सकती है. कुछ दिन पहले ही भीड़ ने इराक स्थित अमेरिकी दूतावास पर हमला किया था. इसके लिए अमेरिका ने इराक पर निशाना साधा था और बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास ने एक जनवरी को अपने सभी सार्वजनिक ऑपरेशन्स को अगले आदेश तक निलंबित करने की घोषणा की थी.
पेंटागन के एक बयान में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के निर्देश पर विदेश में रह रहे अमरीकी सैन्यकर्मियों की रक्षा के लिए कासिम सुलेमानी को मारने का कदम उठाया गया है. यह हवाई हमला भविष्य में ईरानी हमले की योजनाओं को रोकने के मकसद से किया गया. अमेरीका अपने नागरिकों की रक्षा के लिए, दुनियाभर में भी चाहे वे जहां भी हैं, सभी आवश्यक कार्रवाई करना जारी रखेगा.
कुद्स फोर्स के प्रमुख जनरल की हुई मौत से भड़के ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैय्यद अली खामेनी ने बदला लेने का संकल्प लिया है. उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि धरती के सबसे क्रूर लोगों ने सम्मानीय कमांडर की हत्या की, जिन्होंने दुनिया की बुराइयों और डकैतों के खिलाफ साहसपूर्वक लड़ाई लड़ी. उनके निधन से उनका मिशन नहीं रुकेगा, लेकिन जिन अपराधियों ने जनरल सुलेमानी और अन्य शहीदों के खून से अपने हाथ रंगे हैं, उन्हें जरूर एक जबरदस्त बदले की, अंजाम भुगतने की प्रतीक्षा करनी चाहिए.
ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने हमले को बेहद खतरनाक और मूर्खतापूर्ण करार देते हुए कहा कि वह अपनी इस तरह की हरकत के लिए परिणामों का जिम्मेदार खुद होगा. IRGC के पूर्व कमांडर मोहसिन रेजाई ने भी कहा कि ईरान इसका बदला अमेरिका से जरूर लेगा. सुलेमानी 1998 से ही ईरान के कुद्स फोर्स का नेतृत्व कर रहे थे और विदेशों में गुप्त अभियानों का संचालन करते हुए सीधे देश के सर्वोच्च नेता खामेनी को रिपोर्ट करते रहे हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की धमकी पर पलटवार करते हुए कहा कि उसने कभी युद्ध नहीं जीता, लेकिन बातों में कभी हारा भी नहीं है. इसके पूर्व ईरान समर्थित प्रदर्शनकारियों ने मंगलवार को बगदाद में अमेरिकी दूतावास परिसर की बाहरी दीवार तोड़ दी थी. प्रदर्शनकारी भीड़ को तितर-बितर करने के लिए परिसर के अंदर आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े थे. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने ट्वीट कर ईरान को धमकी दी थी कि- “हमारी किसी भी संपत्ति को किसी तरह का नुकसान पहुंचने और ज़िंदगियां ख़त्म होने के लिए ईरान को पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा. वे इसकी बड़ी कीमत चुकाएंगे और ये कोई चेतावनी नहीं है. नया साल मुबारक़ हो.”
डॉनल्ड ट्रंप की इस धमकी के बाद स्पष्ट था कि अमेरिका कोई बड़ा कदम उठा सकता है लेकिन ईरान के बेहद शक्तिशाली मेजर जनरल की मौत का ही फरमान सुना देंगे इसकी उम्मीद नहीं थी. दोनों देश के बीच प्रतिबंध और बयानबाजी का दौर लम्बे समय से चल रहा है पर ईरान के बेहद ताकवर मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद सवाल खड़े हो गये हैं कि अब दुनिया में क्या होने वाला है? वर्ल्ड वॉर 3 की का आगाज़ होने वाला है क्या?
इस तनाव का प्रभाव वैसे तो पूरी दुनिया पर पड़ेगा पर मध्य पूर्वी एशिया पर बहुत हद तक निर्भर भारत का व्यापार तथा तेल आयात प्रभावित होगा. जिसके कारण भारत की चिंता काफी बढ़ गई है.
पिछले वित्त वर्ष में भारत ने 84% कच्चा तेल ईरान से आयात किया था. अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव इसी तरह बरकरार रहता है तो इसका सीधा असर हमारे यहाँ तेल के दामों पर पड़ेगा. जिससे देश की अर्थव्यस्था पर सीधे असर देखने को मिलेगा. सरकार का वित्तीय घाटा बढेगा. वर्तमान में भारत के पास रिजर्व के तौर पर केवल 3.91 करोड़ बैरल तेल मौजूद है, जो दस दिन भी नहीं चल सकता. तेल की कमी से इसकी मौजूदा कीमतों में बढ़ोतरी होगी, देश में महंगाई बढ़ेगी.

ईरान के रास्ते अफगानिस्तान तक सीधा संपर्क स्थापित करने के लिए भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट में करोड़ों डॉलर का निवेश कर रखा है, सड़क मार्ग का निर्माण भी कराया है. चाबहार पोर्ट के कारण भारत अपना माल अफगानिस्तान और ईरान के अलावा रूस, तजकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजकिस्तान और उजेबकिस्तान भेज पा रहा है. इससे भारत के व्यापार में लगातार वृद्धि हो रही है. हथियारों की खरीद के कारण रूस से बढ़ रहे व्यापार घाटे को भी कम करने में भारत को मदद मिल रही है. चीन और पाक द्वारा संयुक्त रूप से विकसित हो रहे ग्वादर बंदरगाह के काट के रूप में भी ईरान के चाबहार को देखा जाता है. हाँलाकि भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है कि अमेरिका ने इस बंदरगाह को ईरान पर लगे प्रतिबंधों से मुक्त कर रखा है. इससे अफगानिस्तान की पाकिस्तान पर निर्भरता खत्म हुयी.


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