प्राथमिक एवं पूर्व प्राथमिक शिक्षा भेदभाव रहित समतामूलक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से ही देश का विकास संभव होगा. शिक्षा की बाजारीकरण पर अंकुश नही लगाया गया तो शिक्षा की सामाजिक धरोहर समाप्त हो जाएगी, जिसका विशेष प्रभाव हाशिये पर खड़े भुक्तभोगी समुदाय पर पड़ेगा. चूँकि बाजारू शिक्षा पूंजीपति शिक्षा बनती जा रही है.
प्राथमिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एव प्रारंभिक सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में स्वैच्छिक संगठन एवं समुदाय की भूमिका पर ऑक्सफेम इंडिया के सहयोग से दलित विकास अभियान समिति द्वारा ताजपुर में आयोजित जिला स्तरीय कार्यशाला में बोलते हुए उक्त बातें मानवाधिकार एक्टिविस्ट सह समिति के निदेशक धर्मेन्द्र कुमार ने कहीं.
इन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा गरीबों के लिए गांव-गांव में आंगनबाड़ी केंद्र खोलने का मुख्य मकसद था विद्यालय जाने से पहले समुचित वातावरण निर्माण और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया जाना ताकि विद्यालय में जब बच्चे पहुँचे तो स्वस्थ्य मानसिकता के साथ शिक्षा प्राप्त कर सकें. इसके बावजूद शिक्षा का विकास ठीक से नहीं हो पा रहा है. शिक्षा के प्रति जागरूकता के अभाव के कारण आंगनवाड़ी केंद्रों में भी बच्चे नहीं पहुंच रहे हैं. यह कार्य सामाजिक आंदोलन के बगैर संभव नही है.
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी मोरवा ईश्वरचंद सिंह ने ऑक्सफेम इंडिया के कार्यो की सराहना करते हुए कहा कि समुदाय की भागीदारी के बिना शिक्षा से अंतिम वर्ग को जोड़ा नही जा सकता. वहीं बबीता कुमारी ने बताया की ऑक्सफेम इंडिया के सहयोग से मोरवा एव ताजपुर प्रखंड के दस आंगनवाड़ी और दस सरकारी स्कूल के साथ सभी बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, भेदभाव रहित शिक्षा, विद्यालय में बच्चों की ठहराव और विद्यालय शिक्षा समिति को सशक्त करने के लिए कार्य किया जा रहा है. हाँलाकि हर वर्ग एव समुदाय के बगैर सहयोग के दोहरी शिक्षा व्यवस्था से मुक्ति नही पायी जा सकती है.
प्राथमिक शिक्षक संघ के अरुण कुमार ने बताया कि विद्यालयों को सुविधाविहीन रखा जा रहा है. शिक्षक के साथ विद्यालय को भी मजाक बनाया जा रहा है. कभी शौचालय गणना तो कभी पशु गणना, इसीके साथ दिनरात डिजिटल रिपोर्ट पर ही शिक्षक की ड्यूटी है. तो फिर सही शिक्षा कैसे संभव है? विद्यालय को सुरक्षित माहौल की व्यवस्था के साथ- साथ प्रशिक्षित शिक्षक की जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षक समुदाय को केवल वेतन एवं सुविधाओं की मांग से ऊपर उठकर, सही शिक्षा प्रदान करने पर भी निरंतर प्रयास करना चाहिए.
फूलकुमारी देवी ने इस अवसर पर कहा कि विद्यालयों में दलित बच्चों के साथ शिक्षा में भी भेदभाव किया जाता है. बच्चों के बैठने की व्यवस्था नहीं है. विद्यालय शिक्षा समिति की नियमित बैठक नही होती हैं. शिक्षक भी सोचते हैं कि सरकारी स्कूल दलित के लिए है, चूंकि उनके बच्चे पूंजीपति स्कूल में पढ़ते हैं. पहले जरूरत है शिक्षक को अपनी शिक्षा पर पकड़ बनाने और समुदाय की भागीदारी के साथ विद्यालय को बेहतर बनाने के कार्ययोजना पर काम करने की.
अम्बेडकर किशोरी क्लब के सदस्यों ने बताया कि आंगनवाड़ी केंद्र दलित बस्ती से काफी दूरी पर रहने के कारण उसका लाभ वास्तविक गरीब तक नही पहुच पाता. स्कूलों का माहौल सुरक्षित नही रहता है. असामाजिक लोगो का वहाँ जमावड़ा बना रहता है, जिस डर से बच्चीयाँ स्कूल नहीं जाना चाहती हैं. सरकारी स्कूल गरीबों के लिए ही है, जहां न तो समय पर पुस्तकें दिए जाते हैं न शिक्षक उपस्थित रहते हैं और न शिक्षकों की पर्याप्त बहाली हो पाई है. फलस्वरूप शिक्षा की स्थिति बदहाल है. अमीरों के लिए अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के कान्वेंट स्कूल चल रहे हैं, जिसमें अमीर अपने बच्चों को पढ़ा कर अपने बच्चों का विकास कर रहे हैं. सरकार द्वारा जब तक गरीब और अमीर के बीच की इस खाई को पाट कर समतामूलक समान शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित नहीं करेगी तब तक देश का सर्वांगीण विकास असंभव है. सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद गरीबों की गरीबी और अमीरों की अमीरी बढ़ती रहेगी. गरीबों की गरीबी दूर करने के लिए अनिवार्य शिक्षा के कानून को धरातल पर लागू करना पड़ेगा.
इस अवसर पर बाल विकास परियोजना पदाधिकारी मंजू कुमारी ताजपुर, संकुल समन्वयक जयप्रकाश मल्लिक, कंचन कुमारी, सुनीता कुमारी, संजीत रजक, राजीव कुमार, फूलकुमारी देवी, संगीता देवी आदि ने भी चर्चा में भाग लिया. बबिता कुमारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया.



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