वर्ष 1971 में दुनिया के सामने एक देश के रूप में आने वाला बांग्लादेश जैसा छोटा सा देश, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेडीमेड गारमेंट्स निर्यातक देश बन भारतीय रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री को कड़ी टक्कर दे रहा है.
बांग्‍लादेश ने 80-90 के दशक में ही रेडीमेड गारमेंट्स के प्रमुख निर्यातक के रूप में अपनी पहचान बना ली. वर्तमान में यह चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेडीमेड गारमेंट्स निर्यातक देश है. भारत छठे स्थान पर है. बांग्‍लादेश को रेडीमेड गारमेंट्स निर्यात से सालाना 30 अरब डॉलर से ज्यादा मिलते हैं. जिसकी तुलना में भारत से रेडीमेड गारमेंट्स का निर्यात 17 अरब डॉलर का है.
वर्ष 1978 में पहली बार बांग्लादेश के रेडिमेड उद्योग के जनक कहे जाने वाले नुरुल कादर खान ने 130 युवा ट्रेनीज को दक्षिण कोरिया ट्रेनिंग के लिए भेजा, जब वहां से ये ट्रेनी लौटे तो बांग्लादेश की पहली गारमेंट फैक्ट्री खोली गई. बाहर से काम लेने की कोशिश शुरू हुई. इसके बाद फिर इस उद्योग ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. बांग्लादेश की करीब 80% निर्यात की आमदनी इस उद्योग से होती है.
बांग्‍लादेश की इस सफलता में वहां की सरकार का योगदान लगातार रहा, सरकार ने कैपिटल, मशीनरी, कच्‍चे माल, डाइस और केमिकल्‍स पर लगने वाले टैक्‍स को तर्कसंगत बनाया और लंबी व छोटी अवधि के कर्ज पर ब्‍याज को भी कम किया. सरकार ने निर्यात को प्रोत्‍साहित करने के लिए मशीनरी और कपास के आयात को ड्यूटी-फ्री रखा. हाँलाकि बांग्लादेश में श्रमिकों का खर्च भारत के मुकाबले एक तिहाई है. इसके अलावा सर्वाधिक अविकसित देशों की श्रेणी में आने के कारण बांग्लादेश को यूरोप के बाजार में प्रवेश करने पर शुल्क नहीं देना पड़ता है.
बांग्‍लादेश टेक्‍सटाइल मिल्‍स एसोसिएशन के सेक्रेटरी जनरल तौ‍फीक हसन के अनुसार क्‍योंकि बांग्‍लादेश में टेक्‍सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स दो सबसे बड़े निर्यातक और रोजगार प्रदान करने वाले सेक्‍टर हैं, इसलिए सरकार भी इनको भरपूर समर्थन देती है. बांग्‍लादेश के कुल निर्यात में टेक्‍सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स की हिस्‍सेदारी 80 फीसदी है, जिससे उसे सालाना 30 अरब डॉलर से ज्यादा मिलते हैं. वहाँ कुल इंडस्ट्रियल एम्‍पलॉयमेंट में टेक्‍सटाइल इंडस्‍ट्री की हिस्‍सेदारी 45% है और 40 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है. बांग्‍लादेश में फेब्रिक की मांग सालाना 20% की दर से बढ़ रही है. जबकि उसकी आवश्‍यकता 3 अरब गज के बराबर फेब्रिक में से 85 से 90% का आयात चीन, भारत, हांगकांग, सिंगापुर, थाईलैंड, कोरिया, इंडोनेशिया और ताईवान से किया जाता है.
बांग्लादेश में दुनिया के सबसे बड़े रिटेल ब्रांड वाल्मार्ट, हैंस एंड मौरिट्ज, प्राइमर्क, राल्फ लौरेन, ह्यूगो बॉस, टॉमी हिलफीगर, बेनेटन, गैप, रिप्ले, जी स्टार रो, जियोर्जियो अर्मानी, कैल्विन क्लीन से लेकर प्यूमा तक ज्यादातर सुपर ब्रांड्स के गारमेंट्स बनते हैं. यहाँ बने टी-शर्ट्स, स्वेटर, ट्राउजर, मेंस और वूमंस शर्ट्स पूरी दुनिया के आलीशान बाजारों और लकदक शो-रूम में बिकते हैं. यहां की फैक्ट्रियों में रोज 1.25 लाख से अधिक टी-शर्ट्स बनती हैं. दुनिया का कोई भी गारमेंट ब्रांड नहीं, जो आउटसोर्सिंग बांग्लादेश से नहीं कराता. इसकी बड़ी वजह बांग्लादेश का सबसे सस्ता श्रम, उत्कृष्ट फिनिशिंग औऱ बेहतरीन गुणवत्ता है.
दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित कंसल्टेंसी फर्म मैंकेंसे का दावा है कि बहुत जल्द बांग्‍लादेश रेडीमेड कपड़ों के निर्यात में चीन को भी पीछे छोड़ देगा. लगता है कि समय का एक चक्र पूरा हो गया है. करीब दो सौ साल पहले कहा जाता था कि ढाका के मलमल और मुर्शिदाबाद के सिल्क का दुनिया में कोई जवाब नहीं, जिसे अंग्रेजों ने चौपट कर दिया था और मैनचेस्टर में बनने वाले हल्के दर्जे के सस्ते कपड़ों से भारतीय बाजार को पाट दिया था. अब संयोग देखिए कि एक ओर बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है, तो वहीं मैनचेस्टर की कपड़ा मिलें और रेडीमेड उद्योग पर ताले लग चुके हैं.


2013 में राणा फैक्‍ट्री गिरने से 1100 की मजदूरों की मौत हुई थी और इसी साल एक अन्‍य फैक्‍ट्री में आग लगने से भी मजदूरों की मौत हुई थी. इस हादसे के बाद जर्मनी ने वहां कपड़ा फैक्ट्री मजदूरों की हालत में सुधार के लिए सहयोग का हाथ बढ़ाया और ‘एकॉर्ड’, ‘एलायंस’ और ‘टेक्सटाइल्स पार्टनरशिप’ जैसे कई कदम उठाए गए. इस पहल के एक साल पूरा होने पर जर्मनी के आर्थिक सहयोग एवं विकास मंत्री स्वयं बांग्लादेश पहुंचे. तीन दशक में पहली बार किसी चीनी राष्ट्रपति ने 2016 में बांग्लादेश का दौरा किया और वहाँ कहा है कि वो बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन और कृषि के क्षेत्र में बांग्लादेश के साथ काम करना चाहते हैं. माना जाता है कि चीनी राष्ट्रपति के दो दिन के बांग्लादेश दौरे का मकसद भारत के इस पड़ोसी से नजदीकियां बढ़ाना था.
ढाका के राणा प्लाजा गार्मेंट कारखाने की घटना के बाद 2013 में 5,300 टका (63 डॉलर) का न्यूनतम वेतन तय किया गया था. अभी चार माह पूर्व नया वेतन 8,000 टका (95 डॉलर) निर्धारित करते हुए अधिकारियों ने कहा कि नए वेतन में 51 प्रतिशत की वृद्धि की गई है और यह दिसंबर से लागू होगी. लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद इस उद्योग से जुड़े कामगार संघों ने नये वेतनमान को अमानवीय और अन्यायपूर्ण करार देते हुए सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया. उनकी मांग है कि मजदूरी कम से कम 16,000 टका तय होनी चाहिये.
इसी बीच बांग्लादेश गारमेंट निर्माता एवं निर्यातक संगठन ने कहा कि भारत एक विशाल बाजार है. बांग्लादेश को भारतीय धागों के शुल्क मुक्त आयात की सुविधा मिलने के बाद से भारतीय कंपनियां बांग्लादेश में बने गारमेंट विशेष कर शर्ट और पेंट के आयात के प्रति आकर्षित हो रही हैं, अब यदि भारत सरकार भारत में आयात पर लगने वाले शुल्क को हटाए तो भारतीय धागों से बने कपड़े दोनों देशों के व्यापार में वृद्धि कर सकते हैं.
भारतीय परिधान जो दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं और इनकी मांग भी दुनियाभर में है, पर कई भारतीय गारमेंट कंपनियां बांग्लादेश से सिले-सिलाए कपड़ों का आयात करने में रुचि ले रही हैं. क्योंकि वहाँ से सस्ते दामों पर गुणवत्ता पूर्ण माल उपलब्ध हो रहे हैं. फिर भी बांग्‍लादेश में इनलैंड ट्रांसपोर्ट, डीप सी हार्बर और बिजली की कमी एक बड़ी समस्‍या है. फेब्रिक की मांग सालाना 20% बढ़ रही है, जबकि कच्‍चा कपास और मैन-मेड फाइबर का उत्‍पादन वहाँ होता ही नहीं है. भारत को मौके की नज़ाकत समझते हुए इसपर ध्यान देन चाहिए.
भारत का सबसे प्राचीन एवं बड़ा उद्योग सूती वस्त्र उद्योग रहा है. वैसे इनका सर्वाधिक केन्द्रीकरण महाराष्ट्र तथा गुजरात (75%) में हुआ, जो सर्वाधिक कपास उत्पादक राज्य हैं. आधुनिक ढंग की सूती वस्त्र की पहली मिल की स्थापना 1818 में कोलकता के समीप फोर्ट ग्लास्टर में और दूसरी 1851 में मुम्बई में की गयी थी, पर दोनों असफल रही. सबसे पहला सफल आधुनिक कारख़ाना 1854 में मुम्बई में ही कावसजी डाबर द्वारा खोला गया, जिसमें 1856 से उत्पादन प्रारम्भ हुआ. इसके बाद भारत में आधुनिक सूती वस्त्र उद्योग का विकास तेज़ी से हुआ.
‘भारत की सूती वस्त्र की राजधानी’ मुम्बई में 65 (महाराष्ट्र में 119) बड़ी मिलें स्थापित हैं. ‘पूर्व का वोस्टन’ अहमदाबाद में 67 (गुजरात में 118), ‘उत्तर भारत का मैनचेस्टर’ कहे जाने वाले कानपुर में दस (उत्तर प्रदेश में 52), कोलकता एवं आस पास में 42, तमिलनाडु में कपास के अधिक उत्पादन तथा पायकारा परियोजना से सस्ती जल विद्युत की उपलब्धता के कारण देश में (अधिकांश सूत निर्माण) सर्वाधिक 439, आन्ध्र प्रदेश 53, केरल में 26, कर्नाटक में 32, मध्य प्रदेश में 26, राजस्थान में 19, हरियाणा में 12, पंजाब में 9, बिहार में 6, उड़ीसा में 5, पाण्डिचेरी में 5 तथा दिल्ली में 5 मिलों द्वारा भी सूती वस्त्र एवं कपास से सूत बनाने का काम होता है.



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