सुप्रीम कोर्ट ने चार हत्या के एक दोषी की सजा माफ करने के UP के राज्यपाल राम नाईक के फैसले को पलटते हुए सवाल किया कि इस तरह के अपराधी को किस आधार पर जल्द रिहा किया जा सकता है?
राज्यपाल के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्यपाल के इस फैसले ने कोर्ट के विवेक को हिलाकर रख दिया है. जस्टिस एनवी रमन और जस्टिस एमएम शांतनागोडर की पीठ ने कहा कि दोषी को उम्र कैद की सज़ा हुई थी, तो आखिर क्या कारण है कि सिर्फ सात साल की सज़ा काटने के बाद ही उसे छोड़ने का फैसला लिया गया.
दोषी मार्कंडेय शाही (60वर्ष) की याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि राज्यपाल ने कैसे अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किसी ऐसे अपराधी को रिहा करने के लिए किया जो चार हत्याओं का दोषी है. वहीं शाही के वकील अमरेंद्र शरन ने दलील दी कि राज्यपाल अपने द्वारा लिए गए संवैधानिक फैसलों का कारण बताने को बाध्य नहीं हैं, लेकिन इस दलील से कोर्ट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. कोर्ट ने कहा कि दोषी ज़मानत पर बाहर था, उस वक्त उसने चार अलग-अलग आपराधिक मामलों को अंजाम दिया. इस पर शाही के वकील ने दोषी मार्कंडेय शाही के खराब स्वास्थ्य को जमानत की वजह बताई.


मार्कंडेय शाही ने ये हत्याएं 1987 में की थीं. उस वक्त पूरा पूर्वांचल में हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही के नियंत्रण में था. इन दोनों में राजनीतिक विरोध था. जहां ये अपराध किए गए थे वो जगह इस वक्त महाराजगंज ज़िले में पड़ती है. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने सितंबर 2017 में शाही की सज़ा माफ कर दी थी, जबकि SSP और DM ने शाही को समय पूर्व मुक्त किए जाने की सिफारिश नहीं की थी. राज्यपाल ने संविधान में अनुच्छेद 161 के तहत दिए गए अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए शाही को मुक्त करने का फैसला लिया था.
राज्यपाल के इस फैसले के खिलाफ महंत शंकरसन रामानुज दास ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर UP सरकार पर शाही का पक्ष लेने का आरोप लगाया था. हाईकोर्ट ने राज्यपाल के फैसले के खिलाफ शाही को पुलिस हिरासत में लेने का आदेश दिया था.
शाही ने खुद की रिहाई के राज्यपाल के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा पलटे जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. शाही पर 1987 में गोरखपुर में 4 लोगों की हत्या समेत आधा दर्जन से भी ज्यादा मामले हैं. 2009 में इन हत्याओं के आरोप में शाही को दोषी पाते हुए गोरखपुर की अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा दी थी.



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