सूचना, समन्वय, सजगता और प्रहार के बल पर सुरक्षाबलों ने इस वर्ष मार गिराए 200 आतंकी

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सुरक्षाबलों द्वारा जम्मू कश्मीर में अलग-अलग ऑपरेशन में 5 आतंकियों के मार गिराए जाने के बाद इस साल अब तक कुल दो सौ आतंकी मारे जा चुके हैं। इसके पूर्व वर्ष 2010 में 232 आतंकी मारे गए थे।
कश्मीर घाटी में आतंकियों के सफाए के लिए शुरू किये गए ऑपरेशन ऑल आउट में बडगाम जिले के पखेरपोरा के फुल्तीपोरा इलाके में 4 आतंकी सेना की गोलियों के शिकार हुए तो दूसरी ओर उत्तरी कश्मीर के सगीपुरा गांव के सोपोर में एक आतंकी मारा गया। इसी ऑपरेशन में एक पैरा कमांडो भी घायल हुआ है।
आतंकियों द्वारा सुरक्षाबलों पर गोलीबारी किए जाने के बाद मुठभेड़ शुरू हुई। सुरक्षा बलों को पखेरपारा के फुल्तीपोरा इलाके में आतंकियों के मौजूदगी के इनपुट मिले थे जिसके बाद सुरक्षा बलों ने इलाके को घेर कर गहन तलाशी अभियान शुरू किया, इस दौरान ग्रामीणों ने जमकर पत्थरबाजी भी की।
इसके बाद खुद को घिरता देख आतंकियों ने सुरक्षा बलों पर फायरिंग शुरू कर भागने का प्रयास किया। सुरक्षा बलों ने आतंकियों की गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब दिया और पूरा पखेरपोरा इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंजने लगा। इस ऑपरेशन में सेना की 10 गढ़वाल के साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) भी शामिल रही। इलाके में एहतियात के तौर पर इंटरनेट सेवा को बाधित कर दिया गया है।

वर्ष 2016 में कश्मीर में आतंकी बुरहान की मौत के बाद पैदा हुए विधि व्यवस्था के संकट के दौरान जिस तरह से स्थानीय और विदेशी आतंकियों ने नयी भर्ती शुरू की थी, उसे देखते हुए सेना, राज्य पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को आतंकियों की नकेल कसने के लिए ऑपरेशन ऑल आउट का निर्देश दिया गया था। ऑपरेशन ऑल आउट का मूल मंत्र बना- सूचना, समन्वय, सजगता और प्रहार। जिसके तहत सभी सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों व नागरिक प्रशासन में पूरा समन्वय बनाए रखते हुए सूचनाओं के आदान-प्रदान को यकीनी बनाया गया। साथ ही नागरिकों के जान माल सम्मान की सुरक्षा को सुनिश्चित किया गया और यही इस ऑपरेशन की सफलता का एक बडा कारण भी है।
कश्मीर और LOC के साथ सटे इलाकों में अपनी सेवाएं दे चुके थल सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत स्वयं ऑपरेशन ऑल आउट की लगातार समीक्षा करते हैं। ऑपरेशन शुरू होने के बाद वह सैन्याधिकारियों, पुलिस व अन्य संबंधित अधिकारियों से बैठक करने आठ बार कश्मीर का दौरा कर चुके हैं। किसी भी तरह का विवाद पैदा होने पर वह बिना देरी स्वयं हस्तक्षेप करते हैं। इससे सेना, पुलिस व नागरिक प्रशासन में अनावश्यक विवाद और असमंजस घटा है। ऑपरेशन ऑल आउट के तहत सेना को वर्ष 2000 के बाद कश्मीर में आतंकरोधी अभियानों के संचालन की खुली छूट मिली है। 2010 में 232, 2011 में 100, 2012 में 50, 2013 में 67, 2014 में 110, 2015 में 108, 2016 में 144 तथा 2017 में अबतक 200 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं।
कश्मीर में सेना द्वारा आतंकरोधी अभियान चलाना बंद कर दिया गया था। कई जगह से सेना के शीविर हटा लिए गए थे। ऑपरेशन की रणनीति तैयार होने के बाद आतंकियों के किले बन चुके विभिन्न इलाकों में एक बार फिर से सेना के कैंप स्थापित किए गए। श्रीनगर व कुछ अन्य शहरों को छोड़ इलाकों में पुलिस व CRPF के साथ सेना को आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाने की पूरी छूट दी गयी।

ऑपरेशन का असर आतंकी संगठनों के अंदर एवं कश्मीर में सक्रिय उनके समर्थकों और ओवरग्राउड नेटवर्क पर भी नजर आने लगा है। मुठभेड़ के समय आतंकियों को बचाने के लिए निकलने वाली हिंसक भीड़ भी लगातार कम होती जा रही है। अधिकांश ओवरग्राउंड वर्कर भूमिगत हो चु़के हैं, , चालीस से अधिक ओवरग्राउंड वर्कर पकड़े जा चुके हैं और कई स्वयं पुलिस के समक्ष सरेंडर करने पहुंच रहे हैं। बंदूक उठाने वाले कई स्थानीय युवक जान बचाने के लिए अब अपने परिजनों के माध्यम से सुरक्षाबलों के समक्ष सरेंडर का अवसर तलाश रहे हैं, तो आतंकी संगठनों को कमांडर नहीं मिल रहा है।
कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ आसिफ कुरैशी के मुताबिक ऑपरेशन ऑल आउट को सफलता-विफलता के पैमाने पर अभी नहीं आंकना बेहतर होगा। हां, बीते कुछ साल के दौरान जिस तरह यहां आतंकरोधी अभियान लगभग बंद हो गये थे, उनका फायदा उठा आतंकी व उनके समर्थक खुलेआम घूमने लगे थे, इससे सुरक्षाबलों का मनोबल लगातार गिर रहा था। इस अभियान के शुरू होने के बाद सुरक्षाबलों का हाथ एक बार फिर ऊपर हुआ है और आतंकियों व उनके समर्थकों को अपनी मांद में घुसने को मजबूर होना पड़ा है। परन्तु यह अभयान कितना सफल रहा है, यह वर्ष 2018 में जून-जुलाई के बाद ही पता चलेगा।


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