सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की राजनीति ध्वस्त, अयोध्या पर 8 फरवरी को होगी अगली सुनवाई

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अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद पर सुनवाई के दौरान मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों ने केस तैयार न होने के आधार पर सुनवाई का पुरजोर करते हुए कहा कि मामले की सुनवाई आम चुनाव के बाद जुलाई 2019 में होनी चाहिए.
मुस्लिम पक्षकारों के वकीलों ने विरोध करते हुए कहा कि अगर कोर्ट सुनवाई जारी रखेगा तो वे उसमें हिस्सा नहीं लेगें और अदालत कक्ष छोड़ कर चले जाएंगे। करीब दो घंटे तक शोरशराबा और बहस चलने के बाद कोर्ट ने सुनवाई टाल दी और आठ फरवरी को फिर सुनवाई करने का निर्णय लिया. सुप्रीम कोर्ट ने 4 माह पूर्व 11 अगस्त को ही अयोध्या मामले में अपीलों पर नियमित सुनवाई के लिए 5 दिसंबर की तारीख तय करते हुए कहा था कि तब तक दस्तावेजों का आदान-प्रदान पूरा कर लिया जाए, क्योंकि इस आधार पर 5 दिसंबर की सुनवाई स्थगित नहीं की जाएगी.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने (28 साल सुनवाई के बाद) अयोध्या में विवादित जमीन तीन बराबर हिस्सों में रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बांटने का आदेश (30 सितंबर, 2010 को) दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर की पीठ कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरु हुई तो शिया वक्फ बोर्ड के वकील एमसी ढींगरा ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि शिया वक्फ बोर्ड का फार्मूला यह है कि जन्मभूमि पर राम मंदिर बन जाए और लखनऊ या फैजाबाद में “मस्जिदे अमन” की तामीर कर दी जाय. कोर्ट ने इसपर कहा कि ये बातें बाद में होंगी, पहले सुनवाई की रूपरेखा तय हो जाए.
इसके बाद कोर्ट में मूल मामले से इतर धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिक सौहार्द की आड़ में राजनीतिक और धार्मिक आस्था को बढ़ावा देने वाली दलीलें दी गयीं. मामले की सुनवायी में कानूनी दांव पेच को दरकिनार करते हुए राजनैतिक नफा नुकसान के आधार पर दलीलें देते हुए मुस्लिम पक्षकारों के वरिष्ठ वकीलों कपिल सिब्बल, राजीव धवन और दुष्यंत दवे ने सुनवाई रोकने के लिए ही एड़ी चोटी का जोर लगाते दिखे.
कपिल सिब्बल ने कहा कि केस अभी सुनवाई के लिए तैयार नहीं है, पूरे दस्तावेज भी दाखिल नहीं हुए हैं. जबकि उत्तर प्रदेश की ओर से तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि सारे अनुवाद और दस्तावेज दाखिल हो गए हैं, सुनवाई रोकने के लिए ऐसी दलीलें नहीं दी जा सकती हैं. सिब्बल ने विरोध जारी रखते हुए कहा ऐसे सुनवाई नहीं हो सकती है, उन्हें हजारों दस्तावेज पढ़ने हैं उसके लिए चार महीने का समय मिलना चाहिए. साथ ही कहा कि इस केस का बहुत ज्यादा राजनैतिक असर है इसलिए कोर्ट को इस पर 15 जुलाई 2019 से सुनवाई शुरू करनी चाहिए. उन्होंने सुब्रमण्यम स्वामी के प्रधानमंत्री को लिखे पत्र और मोहन भागवत के 2018 में मंदिर निर्माण के मीडिया में आये बयान का हवाला तक इस संदर्भ में दिया.

तुषार मेहता ने ऐसी दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि केस का राजनैतिककरण हो रहा है ये दलीलें ठीक नहीं है. रामलला के वकील सीएस वैद्यनाथन और हिन्दू पक्ष के वकील हरीश साल्वे का भी कहना था कि दूसरा पक्षकार कोर्ट में राजनैतिक भाषण दे रहा है. साल्वे ने कहा कि कोर्ट को यह नहीं बताया जा सकता कि उसकी सुनवाई का क्या राजनैतिक असर होगा. ये जमीन पर हक का मुकदमा है और अन्य मामलों की तरह ही सुना जाना चाहिए.
राजीव धवन ने यहाँ तक कहा कि मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल (अक्टूबर 2018) तक सुनवाई पूरी नहीं हो पाएगी, इस दलील पर ऐतराज जताते हुए न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने कहा कि ये कैसी बात है. हाईकोर्ट में 90 दिन में बहस पूरी हो सकती है और यहां अपील पर साल भर में भी सुनवाई नहीं हो पायेगी?
सिब्बल ने कहा न्याय होना ही जरूरी नहीं है बल्कि न्याय होते दिखना भी चाहिए, आखिर इस पर सुनवाई की इतनी जल्दी क्यों है? सात साल से सुनवाई नहीं हुई तो अचानक केस कैसे लग गया? इस पर कोर्ट ने कहा कि सात साल सुनवाई नहीं हुई तो क्या कभी शुरू नहीं होनी चाहिए? कोर्ट ने सुनवाई जारी रहने पर कोर्ट छोड़ कर जाने की वकीलों की धमकी पर ऐतराज जताते हुए अपने आदेश में इसे अचरज के साथ दर्ज किया. सुप्रीम कोर्ट में ढाई घंटे चली सुनवाई में क़ानूनी दांवपेंच के स्थान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और दिग्गज वकील कपिल सिब्बल और उनके साथियों ने ज्यादातर दलीलें राजनीतिक दीं.

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