सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगे : चुनाव आयोग

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राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए चुनाव आयोग ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट मे एक याचिका का खुलकर समर्थन करते हुए कहा कि दोषी करार लोगों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगना चाहिए।
आयोग की वकील मिनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि आयोग इस बारे में कानून संशोधित करने के लिए सरकार को भी लिख चुका है। इस पर कोर्ट ने आयोग से सरकार को भेजी गई सिफारिश का ब्योरा मांगा। केन्द्र सरकार ने नेताओं के मुकदमों के जल्दी निपटारे के लिए विशेष अदालतों के गठन का तो समर्थन किया लेकिन सजायाफ्ता के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने के मामले में स्थिति साफ नहीं की है। सरकार ने कहा कि आजीवन प्रतिबंध लगाने के बारे में चुनाव आयोग और विधि आयोग की रिपोर्टो पर अभी विचार चल रहा है। सरकार अपने हलफनामे में पहले ही छह साल की अयोग्यता को पर्याप्त कह चुकी है। सरकार को इस बारे में कोई फैसला करने से पहले सभी राजनैतिक दलों से सहमति बनानी होगी जो कि थोड़ा मुश्किल काम है।

केन्द्र सरकार ने आजीवन प्रतिबंध लगाने का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई उदाहरण नही दे पाया है जिसमें कोई जनप्रतिनिधि सजा काटने के बाद दोबारा चुनकर आया हो। हालांकि उसकी पत्नी और बच्चे जरूर चुनकर आये हैं लेकिन वह व्यक्ति नहीं आया। इस तरह सरकार की ओर से सीधे तौर पर तो लालू प्रसाद का जिक्र नहीं हुआ लेकिन इशारा शायद उन्ही की ओर था। क्योंकि लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में दोषी करार होने के बाद चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए हैं लेकिन उनकी पत्नी राबड़ी देवी व बच्चे चुने हुए जनप्रतिनिधि हैं।
चुनाव आयोग ने बुधवार को कोर्ट में स्वीकार किया कि वह जनप्रतिनिधि कानून की धारा 11 के तहत मिले अधिकार में सामान्यता आफिस आफ प्राफिट आदि के मामलों में ही अयोग्यता की अवधि पर फैसला लेता है या उन्हें घटाता है। सिर्फ एक बार आयोग ने आपराधिक मामले में सजायाफ्ता की अयोग्यता अवधि घटाई थी। हालांकि कोर्ट ने धारा 11 के तहत जनप्रतिनिधि की अयोग्यता अवधि समाप्त करने या घटाने के मिले अधिकारों पर आयोग से हलफनामा मांगा है। कोर्ट ने कहा कि वह जानना चाहता है कि आयोग इस अधिकार का इस्तेमाल कैसे और कब करता है।
उत्तर प्रदेश के फरेंदा सीट से 1977 में चुनाव जीत कर आये श्याम नारायण तिवारी की अयोग्यता अवधि चुनाव आयोग ने पांच साल से घटा कर ढाई साल कर दी थी। तिवारी को हत्या के अपराध में सजा हुई थी। बाद में सरकार ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उनकी सजा माफ कर दी थी। सजा माफ होने के बाद तिवारी ने चुनाव लड़ा और जीत गए। जिसके बाद उनकी अयोग्यता का मामला चुनाव आयोग के सामने आया और आयोग ने उनकी कुल अयोग्यता की अवधि पांच साल से घटा कर ढाई साल कर दी थी।

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