संस्कृत के 72 वर्षीय विद्वान हयातउल्ला को 50 वर्ष पूर्व मिली चतुर्वेदी की उपाधि

 78 



हयात उल्ला चतुर्वेदी एक ऐसा नाम जिनके ज्ञान और कर्मठता के सामने मजहब की सारी दीवारें बौनी हो जाती है। देश की एकता और अखंडता के लिए समर्पित पेशे से अध्यापक हयात उल्ला जी को संस्कृत भाषा के संपूर्ण ज्ञान के कारण चतुर्वेदी की उपाधि मिली है।
UP के कौशांबी जिला निवासी हयात उल्ला चतुर्वेदी एमआर शेरवानी इंटर कॉलेज में संस्कृत पढ़ाते थे। 2003 में वहाँ से रिटायर होने के बाद भी उन्होंने छात्रों को पढ़ाना नहीं छोड़ा। पिछले 14 साल से महगांव इंटर कॉलेज में वह छात्रों को संस्कृत पढ़ाते हैं। संस्कृत में विद्वता के लिए 1967 में ही उन्हें एक राष्ट्रीय सम्मेलन में चतुर्वेदी की उपाधि मिली थी।
चारों वेदों के ज्ञाता हयात उल्ला चतुर्वेदी के घर में भी संस्कृत भाषा में ही बातचीत होती है। 72 साल की उम्र में भी उनके अंदर ज्ञान बांटने का जज्बा विद्यमान है, जो अन्य लोगों को प्रेरणा देता है। उन्हें पढ़ाने का मोह आज भी नहीं छूटा है। विषय भी ऐसा कि लोगों को नाम सुनते ही पसीना छूटने लगता है, पर यही विषय उनकी पहचान बना और आज वह संस्कृत के विद्वानों के बीच देश के कोने-कोने में जाने जाते हैं। बच्चों के बीच ज्ञान बांटने के जज्बे के आड़े उनकी उम्र की लाचारी कभी नहीं आयी।
संस्कृत के बुद्धिजीवियों की जुबान पर पुरस्कार की बात होते ही बरबस हयात उल्ला चतुर्वेदी का नाम आ जाता है। मुस्लिम धर्मावलम्बी होने के बावजूद हयात उल्ला साहब की लगन ने उन्हें संस्कृत भाषा का विद्वान बना दिया। पचास वर्ष पूर्व चतुर्वेदी की उपाधि से सम्मानीत होने के बाद भी उन्हें आजतक राष्ट्रपति पुरस्कार नहीं मिला, जो पुरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है।

हयात उल्ला चतुर्वेदी का मानना है कि भाषा का ज्ञान मजहब की दीवार को गिरा देता है, जो आज के समय की बुनियादी जरूरत है। उन्होंने संस्कृत विषय में कई किताबे लिखी हैं। हाईस्कूल की परिचायिका को भी उन्होंने अनुवादित कर सरल बनाया है। इसके अलावा उनकी दिग्दर्शिका भी जल्द ही छपने वाली है। राष्ट्रीय एकता एवं संस्कृत के प्रचार- प्रसार के लिए वह अमेरिका, नेपाल, मॉरीशस आदि कई देशों में आयोजित सेमिनार में भाग ले चुके हैं।
उनके छात्रों (जो आज संस्कृत के शिक्षक हैं) के अनुसार हयात उल्ला चतुर्वेदी का पढ़ाने का तरीका दुसरे अध्यापकों से भिन्न है। वह बच्चों को समझाने के लिए हिंदी, उर्दू और संस्कृत भाषा का जब एकसाथ प्रयोग करते है, तो उन्हें बेहतर ढ़ंग से समझ में आता है। महगांव इंटर कालेज में शिक्षण कार्य करने वाले हयात उल्ला चतुर्वेदी साहब के साथ पढ़ाने वाले उनके सहयोगी अध्यापक भी उनको अपना आदर्श मानते हैं।
साथी अध्यापकों का कहना है कि शुरुआती दिनों में उनको बड़ा आश्चर्य होता था कि मुस्लिम परिवार की सख्सियत कैसे ब्राम्हणों की भाषा का विद्वान हो सकता है? लेकिन अब उनके ज्ञान और जज्बे को देख उन्हें भी प्रेरणा मिलती है, साथ ही हमको उनपर फक्र है। वह गंगा-यमुनी संस्कृति की एक धरोहर के साथ अध्ययन और अध्यापन कार्य करते है। यदि भारत को समझाना है तो उसके गांवो का रुख करना होगा। जहां आप को हयात उल्ला चतुर्वेदी जैसी हजारों सख्सियत आज भी मिलेंगी, जो दुनिया में आज भी धर्म और मजहब की कड़वाहट से दूर एक ऐसा पीढ़ी तैयार करने में लगे हैं, जो सही मायने में भारत के भाग्य विधाता बनेंगे, जो सही मायने में देश को नई ऊंचाईयों तक ले जा सकेंगे।

हर ताज़ा अपडेट पाने के लिए Pileekhabar के Facebook पेज को लाइक करें

loading…


Loading…



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *