ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ऐलान किया कि जो लोग शरिया कारणों के बिना तीन तलाक देंगे उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। साथ ही कहा कि शरई कानूनों में किसी भी तरह की दखलंदाजी को सहन नहीं किया जायेगा, बोर्ड तीन तलाक पर पाबंदी के खिलाफ हैl मुस्लिम बेटी कोसंपत्ति में हिस्सा दें तथा तलाकशुदा महिला की मदद की जायl बोर्ड ने बाबरी मस्जिद मुददे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने की बात कही।
बोर्ड ने कहा कि तीन तलाक के कानून में बदलाव के बजाए इसका दुरुपयोग करने वाले व्यक्तियों के आचरण में सुधार की जरूरत है। साथ ही कहा कि उन्हें अपने मुल्क में मुस्लिम पर्सनल लॉ पर अमल करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।
बोर्ड के महासचिव मौलाना वली रहमानी ने कार्यकारिणी में कहा कि देश में पर्सनल लॉ पर कुछ इस तरह चर्चा होने लगी है कि उनकी अहमियत और उपयोगिता पर सवाल खड़े किए जाने लगे हैंl साथ ही शरीअत के बारे में कोई जानकारी ना रखने वाले लोगों ने भी इस पर उंगली उठाना शुरू कर दिया है। ऐसे हालात में शरीअत का सही रूप देश के सामने रखने के लिए बोर्ड की जिम्मेदारी और बढ़ गई हैl

मौलाना ने कहा कि मुल्क में मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर बोर्ड द्वारा हाल में चलाए गए हस्ताक्षर अभियान के माध्यम से मुसलमानों ने एक बार फिर यह बता दिया कि हिन्दुस्तान का संविधान इस देश के तमाम नागरिकों को अपने धार्मिक मामलों पर अमल करने की आजादी देता है और मुसलमान मर्द और औरतें शरई कानूनों में कोई भी बदलाव या हस्तक्षेप नहीं चाहतेl बोर्ड ने फिर से एक बार इस बात को साफ किया कि धार्मिक आजादी हमारा संवैधानिक अधिकार है और शरई मामलों में सरकार का हस्तक्षेप बिलकुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगाl बैठक की अध्यक्षता बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद राबे हसनी नदवी ने की.
बोर्ड ने मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने के लिये 11 अप्रैल को कहा था कि वह सोशल मीडिया का सहारा लेगा। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि अगले डेढ़ साल में तीन तलाक को खत्‍म कर दिया जाएगा। इस मामले में उन्होंने सरकार को दखल न देने को कहा था।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने 30 मार्च को एक बड़ा फैसला लेते हुए तीन तलाक और तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के मामले सुनने के लिए संविधान पीठ का गठन किया था। पांच जजों की यह पीठ 11 मई से इस मामले की सुनवाई करेगी। पीठ में मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर भी हो सकते हैं।
मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने सुनवाई का विरोध करते हुए कहा था कि कोर्ट धर्म से जुडे मसलों को संविधान की कसौटी पर नहीं कस सकता। मौलिक अधिकार व्यक्ति के खिलाफ लागू नहीं किये जा सकते। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में दी लिखित दलीलों में कहा है कि तीन तलाक पवित्र कुरान में उल्लेखित है जिसे संविधान की कसौटियों पर तोलना करान के फिर से लिखने जैसा होगा जिसकी इजाजत नहीं है।
वहीं कई मुस्लिम महिला संगठनों तथा तीन तलाक की पीडितों ने कहा है कि तीन तलाक बेहद गलत और महिलाओं के खिलाफ है। पुरुष फोन पर तलाक देकर महिला को सड़क पर कर देते हैं न तो उसे भरण पोषण भत्ता मिलता है और न ही कोई सुरक्षा, जिससे उसका जीवन नरक हो जाता है।
केंद्र सरकार ने तीन तलाक और बहुविवाह को असंवैधानिक करार दिया है और वह मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में है। सरकार ने कहा है कि मुस्लिम देशों में तीन तलाक की प्रथा नहीं है जबकि मुस्लिम धर्म वहीं से आया है।

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