वकालत कर रहे सभी सांसदों-विधायकों को नोटिस

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सभी निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को जिन्होंने एक अधिवक्ता के रूप में वकालत करना जारी रखा है भारतीय बार परिषद (BCI) ने नोटिस जारी किया है.
BCI ने ऐसे सभी सांसदों और विधायकों को वकालत करने से रोकने की मांग वाली अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर उनसे जवाब मांगा है. कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, के टी एस तुलसी, अभिषेक मनु सिंघवी, कल्याण बनर्जी और मीनाक्षी लेखी सहित अन्य विधिनिर्माताओं से एक सप्ताह के भीतर जवाब माँगा गया है.
BCI प्रमुख मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि ‘‘नियमों के अनुसार, सरकारी कर्मचारी अधिवक्ता के तौर पर वकालत नहीं कर सकतें. हमने संस्था के सामने भाजपा की दिल्ली इकाई के प्रवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की दायर याचिका के आधार पर नोटिस जारी किया है. उपाध्याय ने भारतीय बार परिषद के नियमों को ध्यान में रखते हुए अदालत के सामने अधिवक्ता के तौर पर वकालत करने से विधायकों और सांसदों को रोकने का अनुरोध किया है.
उपाध्याय की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि ये विधिनिर्माता उस समय भी अधिवक्ता के तौर पर पेश होते हैं, जब संसद या विधानसभाओं का सत्र चल रहा होता है और वे देश के वित्तीय हितों तथा उनके जीवनसाथी, बच्चों, रिश्तेदारों, सहयोगियों, संगठनों के वित्तीय हितों को प्रभावित करने वाले मामलों में भाग लेते हैं. याचिका में कहा गया है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के सदस्यों को अधिवक्ता के रूप में वकालत करने की अनुमति नहीं है लेकिन निर्वाचित प्रतिनिधियों, जो कि लोकसेवक भी हैं, को अनुमति है. उन्होंने दावा किया कि यह संविधान की भावना के विपरीत है.
भारतीय बार परिषद की स्थापना 1961 में हुयी थी, जो भारत में विधि संस्थानों की एक नियामक स्वायत्त संस्थान है. परिषद ही व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार एवं विधि शिक्षा के मानक तय करती है.

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