लावारिश शवों का अंतिम संस्कार करने को हैं समर्पित

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निसार अहमद एक ऐसा नाम है, जिसने लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने को ही अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य बना लिया है। कहा जा सकता है कि इन्होंने अपना जीवन मुर्दों को समर्पित कर रखा है।
अहमद दुनिया से कूच कर चुके लोगों के प्रति असीम संवेदनाएं रखते हैं। भाग दौड़ भरे आज के जीवन में जहां लोगों के पास जिंदा इंसानों के लिए समय नहीं, उनके प्रति संवेदनाओं का अभाव है। लोग दुर्घटनाग्रस्त लोगों को सड़क पर छटपटाता देख मुंह मोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। वैसी स्थिति में सड़क पर पड़ी किसी लाश के प्रति संवेदना की बात सोचना भी बेमानी लगता है।
परन्तु बिहार के मुंगेर शहर के निमतल्ला मोहल्ले मे घुघनी- पकौड़ी और चाय की दुकान चलाने वाले 84 वर्षीय निसार अहमद का जीवन दुनिया से रुखसत हो चुके लोगों को समर्पित है। बात चौंकाने वाली हो सकती है, पर मुर्दों के प्रति संवेदनाएं रखने वाले निसार लावारिस लाशों के लिए मसीहा हैं।
जीवन के अंतिम पायदान पर खड़े 12 जनवरी 1934 को एक सामान्य परिवार में जन्मे निसार अहमद के अनुसार उन्हें लावारिस शवों के अंतिम संस्कार करने की प्रेरणा अपने पिता मो. हाफिज अब्दुल मजिद से मिली थी।


कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़े निसार अहमद के अनुसार उन्होंने अंजुमन मोफीदुल इस्लामनामा नामक संस्था की स्थापना की थी। 1967-68 में मुंगेर के सूतूरखाना में एक समारोह के भोजन में जहर मिले होने के कारण चार लोगों की मौत हो गई थी। इन सभी का अंतिम संस्कार अब तक 2091 शवों का अंतिम संस्कार कर चुके निसार अहमद ने ही किया था।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गुलाम सरवर, पूर्व मंत्री रामदेव सिंह यादव एवं उपेंद्र प्रसाद वर्मा के सहयोग से निसार ने पूरबसराय में नेशनल उर्दू गर्ल्स कॉलेज की स्थापना 1972 में की थी। निसार ने औरंगजेब के बनाए गए जामा मस्जिद के एक कोने में अपना छोटा सा बैठकखाना बना रखा है। जिसमें लावारिस शवों की हजारों तस्वीर लगी है। एक शव के अंतिम संस्कार में दो से तीन हजार खर्च पड़ते हैं। निसार इस राशि का इंतजाम स्वयं को मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन की राशि और चंदा से करते हैं।
निसार कहते हैं कि इंतकाल के बाद हमारे बच्चों की आंखों में आंसू इसलिए होंगे कि मैं उनके लिए कुछ छोड़कर नहीं गया। मैं जनता हूँ कि हमारी मैय्यत पर किसी यार-दोस्त के दो बूंद आंसू नहीं गिरेंगे, मगर जीवन के अंतिम सांस तक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करता रहूँगा।

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