रे शिखंडियो ! मौन तोड़ अब कुछ तो आज करो ! ~ कवि आचार्य विजय गुंजन

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रे शिखंडियो ! मौन तोड़ अब
कुछ तो आज करो !

क्रूर – नीच पाकिस्तानी है नंगा नाँच रहा
पग-पग पर है आज मौत की आयत बाँच रहा

लड़ो नहीं तो चुल्लू भर
पानी में डूब मरो ! रे शिखंडियो ……

क्या है तेरी मजबूरी ये हम भी जान रहे
छुद्र स्वार्थवश बेच देश के तुम अभिमान रहे

जन-मन की भावना समझकर
आगे आज बढ़ो ! रे शिखंडियो ………..


उधर चीन आँखे तरेंरकर तुमको घुड़क रहा
और इधर तू दुम सुट्काकर बिल में दुबक रहा
कायरता को तजो और
कर में गांडीव धरो ! रे शिखंडियो ……….

वाह्य शत्रु से खतरनाक अन्दर के काले लोग
हंस बने ये कंस लगाते हैं मोती के भोग


कहाँ छुपे हो कृष्ण ! प्रजा का
आकर कष्ट हरो ! रे शिखंडियो …………..

नीच – भ्रष्ट – शोषक बनकर नक्सल को जन्म दिए
जर- ज़मीन – वन से तुमने उनको बेदखल किये

कम से कम अपनों की लाशों पर
मत अब गणित बरो ! रे शिखंडियो ………..!!

–आचार्य विजय गुंजन (५\५\१३)





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