राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर 8 फरवरी से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

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राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर 8 फरवरी 2018 से सुनवाई होनी है। इस मामले को लेकर देश की सर्वोच अदालत में कुल 13 याचिकाएं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पिछली सुनवाई में यह साफ कहा था कि मामला बेहद गंभीर है और पहले इसमें यह तय किया जाएगा कि विवादित ज़मीन पर हक किसका बनता है।
देश की सर्वोच अदालत में इस मामले पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर की तीन सदस्यीय बेंच में सात साल बाद 11 अगस्त को 2017 को सुनवाई शुरू हुयी थी। हाँलाकि पिछली सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने कहा था की 5 या 7 जजों की बेंच इस मामले में सुनवाई करे और यह सुनवाई 2019 लोकसभा चुनाव के बाद हो।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 30 दिसंबर 2010 को इस मामलें में फैसला सुनाया था, इस फैसले में विवादित क्षेत्र की दो तिहाई जमीन हिन्दुओं को और एक तिहाई जमीन मुस्लिम समुदाय के लोगों को देने का निर्णय लिया गया था। ये फैसला दोनों ही समुदाय के लोगों को नामंजूर था और सभी पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए कई याचिकाएं दाखिल की।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त को इस मामले में पहली सुनवाई के दौरान सभी पक्षकारों को अलग-अलग भाषाओं वाले अपने-अपने दस्तावेज़ों का अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए 12 हफ्ते का वक्त दिया था। इस मामलें में 9,000 पन्नों के दस्तावेज संस्कृत, पाली, फारसी, उर्दू और अरबी समेत करीब 7 भाषाओं में तथा 90,000 पन्नों की गवाहियां दर्ज हैं।
कहा जाता है कि मुगल बादशाह बाबर ने यहां सन 1528 में मस्जिद बनवाई थी। हिन्दू इसे भगवान राम की जन्मभूमि बताते हुए दावा करते हैं कि मंदिर तोड़कर यहां मस्जिद बनाई गई थी। सन 1853 में पहली बार इस मामले ने तूल पकड़ा और यहां की ज़मीन पर हक को लेकर साम्प्रदायिक हिंसा हुई। सन 1949 में अचानक मस्जिद वाले हिस्से के अंदर भगवान राम की मूर्ति मिलने पर विवाद फिर शुरु हो गया। मुसलमानों ने आरोप लगाया कि हिन्दुओं की ओर से यह मूर्ती रखी गई है। इसके बाद मामले जे जुड़े पक्षों ने अदालत का रुख किया। सन 1986 जिला जज ने आदेश दिया कि विवादित परिसर का ताला खोल दिया जाए और हिन्दुओं को पूजा करने की इजाजत दी गई।
6 दिसंबर 1992 को कार सेवकों की उन्मादी भीड़ ने देखते ही देखते बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। पूरे देश में दंगे हुए, जिसमें दो हजार से ज़्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई। 30 दिसंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए विवादित परिसर को तीन हिस्सों, जिसमें दो तिहाई हिस्सा हिन्दू पक्षकारों को और एक तिहाई हिस्सा वक्फ बोर्ड को सौंपने का फैसला सुनाया। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिए फैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। 2017 में तत्कालीन चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर ने इस मामले की कोर्ट के बाहर समाधान की वकालत करते हुए कहा कि वो इसमें मध्यस्थता करने के लिए भी तैयार हैं। 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और RSS के कई और नेताओं पर आपराधिक साजिश का केस चलाने का आदेश दिया। 16 नवंबर 2017 को आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने अपने स्तर पर इस विवाद को सुलझाने के लिए पहल की और उन्होंने कई पक्षों से बातचीत भी की।

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