महान विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाजसुधारक डा० भीमराव अंबेडकर बाबा साहेब के नाम से लोकप्रिय थे। जिन्होंने दलितों के खिलाफ सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध अभियान चलाया, श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया और बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया। स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री एवं भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार बाबा साहेब विपुल प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञानं के शोध कार्य में ख्याति प्राप्त की, अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवं वकालत भी की। बाबा साहेब के अंतिम संस्कार के समय उन्हें साक्षी रखकर उनके करीब दस लाख अनुयायिओं ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, जो विश्व इतिहास में पहिली बार हुआ।
बाबा साहेब ने 1920 में बंबई से साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की, जो जल्द ही काफी लोकप्रिय हुआl बाबा साहेब इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये करते थे। बाबा साहेब ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् 1926 में वो बंबई विधान परिषद के लिए मनोनीत हुये। 1927 में बाबा साहेब ने छुआछूत के खिलाफ, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने, अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिये एक व्यापक आंदोलन, सत्याग्रह शुरू करने का फैसला किया। बाबा साहेब ने 1927 में एक दूसरी पत्रिका “बहिष्कृत भारत” और उसके बाद रीक्रिश्टेन्ड शुरू की। अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास करमचंद गांधी की आलोचना उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान डॉ॰ आंबेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है।
बाबा साहेब की बढ़ती लोकप्रियता और उन्हें मिल रहे जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया,(बाबा साहेब ने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया था)।  1932 में जब अंग्रेजों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की, तब गांधीजी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। इसके बाद रूढ़िवादी कांग्रेसी नेताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय नेअम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की आशंका और गाँधी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते बाबा साहेब ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छूआ-छूत ख़तम करने की बात स्वीकार कर ली गयी। पूना संधी को गांधीवादी इतिहासकार ‘अहिंसा की विजय’ लिखते हैं, परंतु यहाँ अहिंसावादी रुख बाबा साहेब ने निभाया। बाद मे बाबा साहेब ने गाँधीजी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये उनके द्वारा खेला गया एक नाटक करार दिया। बाबा साहेब के अनुसार असली महात्मा तो ज्योतीराव फुले थे। बाबा साहेब बहूत प्रतिभाशाली एवं जुंझारू लेखक थे, भारत के केन्द्रिय बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना उनकी सोच पर ही हुई है। उन्हें अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, पालि, संस्कृत, गुजराती, जर्मन, फारसी, फ्रेंच और बंगाली, 6 भारतीय और 4 विदेशी कुल दस भाषाओं का ज्ञान था। सामाजिक संघर्ष में हमेशा सक्रिय और व्यस्त होने के बावजुद अपने समकालिन सभी राजनेताओं की तुलना में सबसे अधिक लिखा, उनकी इतनी सारी किताबें, निबंध, लेख एवं भाषणों का इतना बडा संग्रह वाकई अद्भुत है। उनके लिखे हुए महान भारतीय संविधान को भारत का राष्ट्रग्रंथ माना जाता है, जो विश्व के प्रमुख महानत् पुस्तकों में एक है।  द बुद्धा एंड हिज धम्मा, हू वेर शुद्रा?, थॉट्स ऑन पाकिस्तान, अनहिलेशन ऑफ कास्ट्स, आइडिया ऑफ ए नेशन, द अनटचेबल, फिलोस्फी ऑफ हिंदुइज्म, सोशल जस्टिस एंड पॉलिटिकल सेफगार्ड ऑफ डिप्रेस्ड क्लासेज, गांधी एंड गांधीइज्म, ह्वाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल और बुद्धिस्ट रेवोल्यूशन एंड काउंटर-रेवोल्यूशन इन एनशिएंट इंडिया आदि राजनिती, अर्थशास्त्र, मानवविज्ञान, धर्म, समाजशास्त्र, कानून आदी क्षेत्रों में उन्होंने कई किताबें लिखीं, जो पुरे विश्व में बहुत प्रसिद्ध हैं और पढी जाती हैं।
बाबा साहेब का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का भीमाबाई था। अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान के रूप में जन्में बाबा साहेब जन्मजात प्रतिभा संपन्न थे। 1894 में बाबा साहेब के पिता सेवानिवृत्त हो गए और इसके दो साल बाद बाबा साहेब के मां की मृत्यु हो गईl 1948 से बाबा साहेब मधुमेह से पीड़ित थे, जून 1954 से वो बहुत बीमार रहे और 6 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई।

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