बड़े बकायेदारों का कर्ज माफ नहीं हुआ : अरुण जेटली

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वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि किसी भी बड़े बकायेदार का कर्ज माफ नहीं किया गया है, बल्कि छह से नौ महीने के भीतर दिवालिया कानून के तहत बारह बड़े बकायेदारों से 1.75 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज की वसूली के प्रयास नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) मे चल रहे हैं.
ज्ञात है कि इन दिनों यह अफवाह जोरों पर है कि सरकार ने बड़े बकायेदारों को राहत दी है. जेटली ने अपनी बातें एक ब्लॉग के जरिए सामने रखी है. जेटली ने लिखा है कि 2008 से 2014 (UPA 1 औऱ 2 का कार्यकाल) के बीच सरकारी बैंकों ने विभिन्न उद्योगों को काफी ज्यादा कर्ज बांटे. लोगों को अफवाह फैलाने वालों से ये पूछना चाहिए कि किसके कहने पर या किसके दवाब में ये कर्ज बांटे गए. उन्हे ये भी पूछना चाहिए कि जब कर्ज या ब्याज चुकाने में देरी हो रही थी तो उस समय की सरकार ने क्या कदम उठाया.
पिछली कांग्रेस सरकार का नाम लिए बगैर जेटली ने आरोप लगाया कि उस समय की सरकार ने कर्ज से जुड़े मानकों को लगातार आसान बनाती रही. नतीजा ये हुआ कि कर्ज नहीं चुकाने के बावजूद बकायदारों का खाता NPA नहीं बना. इन खातों को नयी शक्ल दी गयी और बैंकों के घाटे को छिपाया जाता रहा. इन बकायेदारों को लगातार कर्ज मिलता रहा. इन सब का नतीजा ये हुआ कि सरकारी बैंकों की हालत खराब होती गयी.
वित्त मंत्री के अनुसार 2008 से 2014 के बीच बैंकों का कुल कर्ज 34 लाख करोड़ रुपये बढ़ा. दूसरी ओर रिजर्व बैंक के विशेष अभियान (असेट क्वालिटी रिव्यू) के जरिए 2015 में पता चला कि फंसा कर्ज काफी ज्यादा है. फंसे कर्ज पहचानने के नए मानकों से पता चला कि सरकारी बैंकों का NPA मार्च 2015 के 2.78 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर जून 2017 के अंत में 7.33 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. दूसरे शब्दों में कहे तो साढ़े चार लाख करोड़ रुपये का फंसा कर्ज छिपाया जा रहा था, जो असेट क्वालिटी रिव्यू की बदौलत ही सामने आ पया.

हमें बैंकों को ज्यादा रकम का प्रावधान करना पड़ा ताकि उनका बैलैंश शीट दुरुस्त हो सके. फंसे कर्ज से होने वाले संभावित घाटे के कुल 3 लाख 79 हजार 80 करोड़ रुपये का प्रावधान करना पड़ा जबकि उसके पहले बीते दस वर्षें में महज करीब दो लाख करोड़ रुपये का प्रावधान करना पड़ा था.
सरकार ने दिवालिया कानून में बदलाव कर जानबुझ कर कर्ज नहीं चुकाने वालों के हाथ बांध दिए हैं. एक अध्यादेश के जरिए ऐसे कर्जदार अपनी उस संपत्ति के लिए बोली नहीं लगा सके जिसे नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने दिवालिया प्रक्रिया के तहत शामिल कर दिया है. मौजूदा व्यवस्था में NCLT कर्ज देने वालों यानी बैंक या वित्तीय संस्थाओं की याचिका पर तय करती है कि किस कंपनी को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए या नहीं. इस प्रक्रिया में कंपनी के निदेशक बोर्ड को भंग कर एक इनसॉलवेंशी प्रोफेशनल नियुक्त किया जाता है.
ये प्रोफेशनल, कंपनी प्रबंधन और बैंकों के साथ मिलकर कंपनी की वित्तीय स्थिति सुधारने और कर्ज चुकाने का रास्ता ढ़ुंढ़ने की कोशिश करता है. इसके लिए शुरुआती तौर पर छह महीने का समय मिलता है जिसे बाद में तीन महीने के लिए और बढ़ाया जा सकता है. इसके बाद भी अगर कंपनी की माली हालत नही सुधरी और कर्ज चुकाने का रास्ता नहीं निकला तो बैंक उसकी संपत्ति बेचने का काम शुरू कर सकते है. यहीं पर शुरू होता है खेल. पहले तो कोशिश यही होती है कि बैंक कुछ डिस्काउंट के बाद बकाया कर्ज का रकम लेना स्वीकार कर लें. तकनीकी भाषा में इसे ‘हेयरकट’ कहते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि बैंक का बकाया अगर 100 करोड़ रुपये है तो वो 50 या 60 करोड़ रुपये पर कर्ज निबटाने की कोशिश की जाती है. इसी का फायदा जानबुझ कर कर्ज नहीं चुकाने वाले उठाते हैं. पहले तो सस्ते में बकाया कर्ज का निबटारे की पहल करते हैं, फिर कंपनी की संपत्ति बिकने की सूरत में बोली भी लगा देते हैं. कोशिश यही होती है कि किसी तरह से मालिकाना हक बना रहे. अब दिवालिया कानून में बदलाव कर इसी प्रवृति को रोकने की कोशिश की गयी है. साथ ही अब कोशिश यह है कि ईमानदार कारोबारी को कर्ज लेने में कोई दिक्कत नहीं हो.
जेटली ने स्पष्ट किया कि मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में बैंको की परेशानियों का न केवल निदान किया गया है, बल्कि उन्हे नए सिरे से मजबूत बनाने की कोशिशें की गयी जो अब रंग भी ला रही है. दूसरी ओऱ भारतीय स्टेट बैंक में उसके सहयोगी बैंकों के विलय से एक मजबूत और बड़ा बैंक बनाने की पहल की गयी है.

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