जिंदगी ने मुझसे मेरा हमसफर छीन लिया, मेरे सपने भले ही टूटे हैं लेकिन हौसला अभी भी जिंदा है। अब सपना है बच्चों को पढ़ा लिखाकर अफसर बनाना। इसके लिए मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊंगी,कुली नंबर 36 हूं और इज्जत का खाती हूं।
बूढ़ी सास और तीन बच्चों की परवरिश का जिम्मा अब इसके कंधो पर आ गया था…। हम बात कर रहे हैं कटनी रेलवे स्टेशन में प्रतिदिन 270 किलोमीटर का सफर तय कर अपनी जिंदगी का बोझ हल्का करने के लिए यात्रियों का बोझ ढो रही महिला कुली संध्या की। रेलवे कुली का लाइसेंस अपने नाम बनवाने के बाद बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना करते हुए साहस और मेहनत के साथ जब वह वजन लेकर प्लेटफॉर्म पर चलती है तो लोग हैरत में पड़ जाते हैं और साथ ही उसके जज्बे को सलाम करने को मजबूर भी।

30 साल की उम्र में वह बच्चों की देखभाल के साथ चूल्हा-चक्की का काम संभाल रही थी, इसी बीच नियति ने धोखा दे दिया। हंसी-खुशी कट रही जिंदगी ने एकदम से करवट बदला और पति भोलाराम को बीमारी ने अपनी आगोश में ले लिया और कुछ दिन बाद पति का देहांत हो गया। इससे घर की स्थिति लडख़ड़ा गई। बच्चों की परवरिश और दो वक्त की रोटी की चिंता उसे सताने लगी तो फिर साहस के साथ संध्या ने हिम्मत से काम लिया। बच्चों के खातिर उसने खुद को संभाला और निश्चित किया कि चाहे कुछ भी हो वह बच्चों की बेहतर परिवरिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।
संध्या प्रतिदिन न सिर्फ दुनिया को बोझ ढ़ो रही है बल्कि प्रतिदिनि 270 किलोमीटर का सफर भी तय कर चंद रुपए जुटा रही है। संध्या प्रतिदिन कुंडम से 45 किलोमीटर का सफर तय कर जबलपुर रेलवे स्टेशन पहुंचती है और फिर इसके बाद कटनी पहुंचती है। वहीं पर काम करने के बाद जबलपुर और फिर घर लौटती है। प्रतिदिन इतनी कठिनाइयों से गुजरकर बच्चों के खातिर काम कर रही है।

पति भोलाराम की मौत के बाद संध्या जनवरी 2017 से मर्दों की तरह सिर और कांधे पर वजन ढो रही है। संध्या कटनी स्टेशन में 45 कुलियों में अकेली महिला कुली है। वह स्टेशन में पहुंचती है और यात्रियों का सामान उठाने आवाज लगाते हुए साथी कुलियों के साथ सिर पर बोझ ढोकर बच्चों के लिए अपनी जिंदगी गुजार रही है।
असमय सिर से पति का साया उठ जाने से संध्या बस यादों में ही सिसककर रह जाती है। उसके सामने बूढ़ी सास की सेवा और बच्चों की परवरिश सबसे बड़ी जिम्मेवारी है। संध्या के तीन बच्चे शाहिल उम्र 8 वर्ष, हर्षित 6 साल व बेटी पायल 4 साल की है। तीनों बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा के लिए वह दुनिया का बोझ ढोकर जिंदगी का बोझ हल्का कर रही है। वो अपने बच्चों को सेना में बड़ा अफसर बनाना चाहती है।

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