प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया का सपना अधर में

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नरेंद्र मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बने तब मीडिया में उनकी चर्चा सोशल मीडिया प्राइम मिनिस्टर के रूप में होती थी और तकनीक के प्रति उनके रुझान की तुलना अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा से की जाती थी. डेढ़ वर्ष बाद ही 2016 में टाइम मैगज़ीन ने उन्हें दुनिया के 30 सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में भी शामिल किया.
पीयू रिसर्च सेंटर के अनुसार 87 प्रतिशत अमेरिकी इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, जबकि भारत के मामले में यह केवल 27 फीसदी है. भारत में दस में से केवल 2 व्यस्क सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का नियमित रूप से इस्तेमाल करते हैं, जबकि अमरीका में दस में से 7 ऐसा करते ही हैं. इसके बावजूद लगभग 4 करोड़ फेसबुक फॉलोवर्स के साथ नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे अधिक फॉलो किये जाने वाले नेता हैं. सोशल मीडिया और ऑनलाइन माध्यमों में उनकी दिलचस्पी और सक्रियता की वजह से लोगो को उम्मीद थी कि केंद्र सरकार के अन्य विभाग भी ऑनलाइन प्लेटफार्म पर अधिकाधिक सक्रिय दिखेंगे. पर हुआ बिलकुल इसके विपरीत.
मोदी के आने के बाद भारत सरकार की प्राथमिकता डिजिटल इंडिया के तहत अधिक से अधिक भारतीयों को वेब से जोड़ने की रही है. इस दिशा में काफी हद तक सफलता भी मिली और दो लाख पचास हजार ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा गया. भारत की पहली बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली के रूप में आधार का इकोसिस्टम तैयार कर इससे डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (लाभुक को सीधे खाते में भुगतान), पैन, मोबाइल बैंकिंग, ऑनलाइन बैंकिंग आदि काफी हद तक इससे जुड़े हैं.


गुड गवर्नेंस में लोगों की भागीदारी के लिए सरकार ने mygov.in नामक प्लेटफार्म विकसित किया जिसपर अब तक 40 लाख से अधिक लोग रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं और लगभग 18 लाख लोगो ने अपने विचार इस पर साझा किये हैं तथा लगभग साढ़े तीन करोड़ कमेंट इस पर आ चुके हैं. ये कदम मील का पत्थर साबित भी हुए हैं. समय- समय पर PMO ने दूसरे मंत्रालयों को सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर सजग और सक्रिय रहने की सलाह भी दी. कुछ मंत्रालय इस मामले में काफी एक्टिव भी रहे हैं उदहारण के तौर पर रेलवे (सुरेश प्रभु और पीयूष गोयल दोनों), विदेश मंत्रालय (सुषमा स्वराज) और पीडीएस (रामविलास पासवान) मंत्रालय. पर इन चंद विभागों के अलावे अधिकतर मंत्रालयों तो अपने सोशल मीडिया पेजों को अपडेट करने तक में रुचि नहीं दिखायी. यह घोर निराशाजनक है, तब तो और भी ज्यादा जब की सरकार का मुखिया सोशल मीडिया पर इतना ज्यादा एक्टिव है.
सामान्य तौर पर देखा जाता रहा है कि विभिन्न मंत्रालयों के ट्विटर अकाउंट जनहित में पूछे गये सवाल पर या आलोचना किये जाने पर आश्चर्यजनक रूप से खामोश रह जाते हैं. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी जो लगभग हर दिन ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं, ने दादरी घटना (एक युवक को गोहत्या करने के शक में पीट- पीट कर मार डाला गया था) के दस दिनों बाद तक चुप्पी साध रखी थी.
सोशल मीडिया पर अपने आलोचकों को ब्लॉक करने और उचित सवाल के जवाब देने से कतराने पर सरकार की साख और विश्वास को धक्का लगता है. किसी मंत्री का स्टेशन पर बेबी diapers से संबंधित ट्वीट करना और किसी एक्सीडेंट के मामले में सोशल मीडिया पर खामोश रह जाना, धार्मिक उन्माद के समय में (जब लोगो को नेताओं के त्वरित प्रतिक्रिया की उम्मीद होती है) किसी नेता द्वारा चुप रह जाना सरकार को कटघरे में खड़ा कर देता है.

सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थंति के साथ ही मोदी सरकार के मंत्रालय जरूरी सूचनाओं के आदान- प्रदान के मामले भी कमतर साबित हुए हैं. 2015 में चेन्नई में बाढ़ के कारण हज़ारों लोग बेघर हो गए, लगभग 500 लोगो की मौत हो गयी. इस विपदा की घडी में सिविल सोसाइटी की ओर से लोगो को जरूरी सूचनायें पहुंचाने के लिए नेटवर्क तैयार किया गया, जबकि ये काम समय रहते सरकार की ओर से किया जाना चाहिए था. साथ ही साथ कई सरकारी वेबसाइट पर आंकड़े अपडेट ही नहीं किये जाते या फिर आधे- अधूरे आंकड़े दिए जाते हैं. हाल ही में सिविल सेवा के अधिकारिओं के लिए एक सोशल मीडिया कोड ऑफ़ कंडक्ट जारी किया गया था, जो अपने आप में ही आधा अधूरा था.
सरकारी तंत्र के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर समान विचाररधारा के पार्टियों और ऐसे लोग के जिन्हे लोग अंध भक्त कहते हैं, वे भी खासा प्रभाव डालते हैं. राइट, लेफ्ट या किसी और विचारधारा की आड़ में सोशल मीडिया पर हाल के दिनों में अनवरत इतना कचरा परोसा गया है कि वहां किसी भी मामले में स्वस्थ बहस की सम्भावना ही समाप्त हो गयी है. दुर्भाग्यवश ऐसा पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से किया जा रहा है.
लोकतान्त्रिक सरकारों से सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर मुख्य रूप से दो उम्मीद की जानी चाहिए. उचित विनियमन और बेहतरीन सेवा के प्रावधान. भारत सरकार इन दोनों ही मामलो में सफल होती नहीं दिख रही है. ग्लोबल कंपनियों द्वारा डेटा चोरी के ताज़ा मामले भी एक सच को बयां कर रहे हैं. एक विनियामक के रूप में सरकार को चाहिये वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाये रखते हुए सोशल मीडिया पर परोसी जानी वाली सामग्री का बिना कोई पक्षपात किये सम्मानजनक स्तर बनाये रखे. नियामक के रूप में मोदी प्रशासन का काम अधिकारिओं की इच्छाशक्ति में कमी और ट्रेनिंग के आभाव में काफी निराशाजनक रही है. दूसरी तरफ एक डिजिटल सेवा प्रदाता के रूप में सरकार को अपने ऑनलाइन यूजर को एक ऑनलाइन सिटीजन मानते हुए आलोचना की स्थिति में भी उसके साथ यथोचित व्यवहार करना चाहिए.
निश्चित तौर पर व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑनलाइन माध्यमों और सोशल मीडिया का बहुत ही प्रभावशाली इस्तेमाल किया है, पर उनके मुखिया रहते हुए भी पूरी सरकार के बारे में आज के समय में ऐसा नहीं कहा जा सकता हैं, जो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है, आवश्यकता है इसमें अविलम्ब सुधार की.
द्वारा- कुमार विवेक

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