पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव को चार एवं वरिस्ट IAS राजीव कुमार की सजा बरकरार

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उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव नोएडा भूखंड आवंटन में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के मामले में चार वर्ष तथा उत्तर प्रदेश के ही पूर्व IAS राजीव कुमार को दो वर्ष कारावास की सजा काटनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने नीरा यादव एवं राजीव कुमार को भ्रष्टाचार के मामलों मे दोषी ठहराए जाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नीरा यादव को दोनों मामलों में अलग अलग सुनाई गई तीन- तीन साल कारावास की सजा घटा कर दो- दो वर्ष कर दी है। दोनों सजाएं अलग अलग चलेंगी, यानी नीरा यादव को चार साल कारावास में गुज़ारना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पूर्व वरिष्ठ IAS राजीव कुमार की सजा भी बरकरार रखी है। हालांकि राजीव कुमार की सजा भी तीन साल से घटा कर दो वर्ष कर दी गयी है। नीरा यादव पिछले वर्ष 14 मार्च से व राजीव कुमार पिछले वर्ष 18 अप्रैल से जेल में हैं।
नोएडा भूखंड आवंटन घोटाला वर्ष 1994-95 के दौरान का है। उस समय नीरा यादव नोएडा की CEO थीं और राजीव कुमार डिप्टी CEO थे। विशेष अदालत और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल नीरा यादव और राजीव कुमार को भ्रष्टाचार निरोधक कानून व अन्य कानूनों में दोषी ठहराया था। विशेष अदालत और हाईकोर्ट ने नीरा को दोनों मामलों में तीन- तीन साल के कारावास की सजा दी थी। दोनों सजाएं अलग अलग चलाने का आदेश था। जबकि राजीव कुमार को दोनों अदालतों से तीन वर्ष के कारावास की सजा मिली थी। कोर्ट ने नीरा पर डेढ़ लाख व राजीव पर पचास हजार का जुर्माना भी किया था। दोनों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।


बुधवार 2 अगस्त को न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ व न्यायमूर्ति आर भानुमती की पीठ ने सजा के खिलाफ दाखिल नीरा यादव व राजीव कुमार की याचिकाएं खारिज करने का साथ ही दोनों मामलों में दी गई सजा एक साथ चलाने की नीरा की गुहार भी ठुकरा दी। कोर्ट ने कहा कि दोनों मामले अलग अलग हैं। एक मामला पद का दुरुपयोग कर स्वयं और अपनी बेटियों के नाम भूखंड आवंटित करने व अन्य अनियमितताएं करके साइट प्लान बदलने का है और दूसरा मामला नोएडा के CEO पद का दुरुपयोग करते हुए राजीव कुमार के साथ साजिश करके राजीव कुमार को भूखंड आवंटित करने का है।
कोर्ट ने कहा मामले के आरोपों, तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद दोनों सजा को एक साथ चलाने का आदेश देना न्यायोचित नहीं। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी सिद्धांत के न्यायिक विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर दोनों सजाएं एक साथ चलाने का निर्देश देना भ्रष्टाचार निरोधक कानून और CRPC के प्रावधानों के खिलाफ होगा।
नोएडा इंटरप्योनर्स एसोसिएशन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए 20 जनवरी 1998 को सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच के आदेश दिये थे। इसके बाद CBI ने 26 फरवरी 1998 को नोएडा की CEO नीरा यादव व अन्य अधिकारियों के खिलाफ 10 जनवरी 1994 से 8 नवंबर 1995 के बीच नोएडा में भूखंड आवंटन मामले में FIR दर्ज की थी। जिसमें आरोप था कि नीरा यादव ने अन्य अधिकारियों के साथ साजिश रच और अपने पद का दुरुपयोग करते हुए नोएडा में भूखंड आवंटन और उनके कन्वर्जन में अनियमितताएं की थीं।

नीरा यादव ने नोएडा की CEO रहते हुए पहले सेक्टर 32 में 300 मीटर का प्लाट बी-002 लाटरी से निकाला। आवंटन के एक हफ्ते के बाद ही उन्होंने किसी दूसरे विकसित सेक्टर मे कन्वर्जन के जरिये दूसरा प्लाट आवंटित करने का आवेदन कर दिया। उनके आवेदन पर सेक्टर 32 का प्लाट बी-002 सेक्टर 14ए में 450 वर्गमीटर के प्लाट 26 में कन्वर्ट कर दिया गया।
नीरा यादव के निर्देश पर प्लाट 26,27 और 28 का लेआउट प्लान बदला गया और प्लाट का साइज 450 से बढ़ा कर 562.50 किया गया। नीरा यादव ने स्वयं को लाभ पहुंचाते हुए इसे मंजूरी दी और इसी तरह नीरा ने अपनी दोनों बेटियों के नाम भूखंड और दुकान आवंटित करने और उसे कन्वर्ट करने में पद का दुरुपयोग किया और स्वयं व बेटियों को अनुचित लाभ पहुंचाया।
नीरा यादव ने सजा माफी की अपील करते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्होंने दिसंबर 2013 में सेक्टर 14ए का प्लाट 26 और उस पर बनी इमारत नोएडा अथारिटी को सरेंडर कर दी है और कभी भी रिफंड का दावा नहीं करेंगी। इसीके आलोक में कोर्ट ने सजा तीन-तीन साल से घटा कर दो- दो साल कर दी।

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