जयन्ती; प्रथम भारतीय शिक्षिका माता सावित्री बाई फुले

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देश की पहली महिला शिक्षिका के रूप में सावित्री बाई फुले ने तमाम कठिनाइयों, अड़चनों, विवादों और अंधविश्वासों का विरोध झेलते हुए नारी शिक्षा की लौ जलायी। नारी सशक्तिकरण और नारी स्मिता के लिए सामाजिक व धार्मिक जड़ता, शराबखोरी, अशिक्षा और अज्ञानता के खिलाफ संघर्ष करने वाली इस युग प्रवर्तक महान नारी के कार्यों और उनके प्रेरणादायी व्यक्तित्व से दुर्भाग्यवश, आनेवाली पीढी अवगत नहीं हो पायी।
नारियों, वंचितों व उपेक्षितों के मुक्तिदायी संघर्ष का नेतृत्व करने वाली सावित्री बाई का व्यक्तित्व हिमालय की तरह विशाल, सागर की तरह धीर-गंभीर और सृजनात्मक था। महात्मा जोतिबा फुले की सहधर्मिनी और सहयोगिनी, त्याग, ज्ञान, कर्मठता, ममता, करुणा, समता की प्रतीक सावित्री बाई फुले के बाद ही आधुनिक भारतीय समाज में नारी के सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने की शुरूआत हुई और नारी दासता का अंत हुआl नारी सशक्तिकरण की जीवंत मिशाल सावित्री बाई अपने कर्मों के बल पर युगों- युगों तक नारी जगत के लिए आईकान (Icon) बनी रहेंगी। उन्हीं के बदौलत आज जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र अछूता नहीं, जहाँ नारी नेतृत्व न होl नारी शक्ति, पुरुषों के कंधे से कन्धा मिलाकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय ना होl
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शिक्षा से वंचित रही आधी आबादी के लिए गौरवमयी प्रेरणास्रोत्र सावित्री बाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिलान्तर्गत खंडाला तहसील के नायगाँव में हुआ था। खंडोजी पाटिल ने अपनी पहली संतान सावित्री बाई फुले के जन्म पर पुरे गाँव के लोगों का मुंह मीठा कराकर ख़ुशी मनाई थी। 5-6 वर्ष की उम्र में ही अनिवार्य रूप से लडकियों की शादी कर देने के रिवाज के बावजूद परन्तु प्रगतिशील विचारों के पोषक खंडोजी पाटिल ने सन 1840 में (नौ वर्ष की उम्र पर) उनकी शादी पुणे वासी गोविन्द राव फुले के पुत्र 13 वर्षीय जोती बा फुले से की। जो तत्कालीन समाज में एक क्रांतिकारी घटना थीl
सावित्री बाई फुले को अक्षर ज्ञान जोती बा फुले ने कराया और नारी को शिक्षा से वंचित रखने वाली सामाजिक व्यवस्था को धक्का पहुंचाते हुए सन 1848 में पुणे स्थित भिडे की हवेली में स्कूल खोला गयाl स्कूल की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले थीं, जो आने वाली पीढ़ी के लिए दीपस्तंभ साबित हुयींl हाँलाकि उनके इस क्रांतिकार्य का प्रखर विरोध हुआl, उन्हें गालियाँ मिली, उनपर पत्थर एवं गोबर फेंके गये, यहाँ तक कि फुले दम्पत्ति पर कातिलाना हमले हुए और उन्हें पिता का घर तक छोड़ना पड़ाl
इनके पूर्व नारी शिक्षा के लिए किये गये सारे प्रयास विफल साबित हुए थेl मिस कुक (मिसेज विल्सन) द्वारा बंगाल (1820), पुणे के शनिवार बाड़े (1830) में कन्या स्कुल खोला, जिसे 1832 में बंद करना पड़ा और 1844 में पुणे के मंगलवार पेठ में खुले कन्या स्कुल को 1847 में बंद करना पड़ा थाl इससे स्पष्ट है कि उस समय स्त्री शिक्षा का कितना विरोध थाl जबकि फुले दम्पत्ति ने एक जनवरी 1848 से 15 मार्च 1852 तक 3 साल में 18 स्कूल खोलेl यह दुरूह कार्य तब हुआ जब धर्म और राजसत्ता शिक्षा के प्रति न केवल उदासीन था बल्कि उसके विरुद्ध कठोर रुख रखता थाl
भारत की प्रथम अध्यापिका, भारतीय नारी की प्रथम नेता और अस्पृश्यता का विरोध करने वाली प्रथम महिला सावित्री बाई फुले का 10 मार्च 1897 को प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए निधन हो गया।

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