चीन के क़र्ज़ तले दबे दुनिया के आठ देशों में पाकिस्तान शीर्ष पर

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चीन की सरकार एक सोची-समझी रणनीति के तहत अपने सरकारी बैंको से देशवासियों की बजाए ज़्यादा क़र्ज़ दूसरे मुल्कों को दे रहा है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में पहली बार चीन के चार बड़े सरकारी बैंकों में से तीन ने देश में कॉर्पोरेट लोन देने से ज़्यादा बाहरी मुल्कों को क़र्ज़ दिए.
चाइना कंस्ट्रक्शन बैंक की तरफ़ दिए जाने वाले विदेशी क़र्ज़ों में 31 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि देश में यह वृद्धि दर 1.5 फ़ीसदी ही है. 2016 की तुलना में 2017 में बैंक ऑफ चाइना की ओर से बाहरी मुल्कों को क़र्ज़ देने की दर 10.6 फ़ीसदी बढ़ी थी.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत कई देशों में आधारभूत ढांचा के विकास के लिए समझौते किए हैं, ये समझौते पूर्णतया एकतरफ़ा हैं. हाँलाकि चीन दुनिया भर के कई देशों में आधारभूत ढांचा के विकास पर काम कर रहा है और उसने भारी निवेश किया है. बताया जाता है कि चीन अपनी कंपनियों को दुनिया के उन देशों में बिज़नेस करने के लिए आगे कर रहा है जहां से एकतरफ़ा मुनाफ़ा कमाया जा सके. बताया जाता है कि चीन अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए क़र्ज़ रणनीति पर तेज़ी से काम कर रहा है.
हिंदुस्तान के लिए चिंता की बात यह है कि दक्षिण एशिया के तीन देश- पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव पर चीन के बेशुमार क़र्ज़ हैं. पिछले साल श्रीलंका को तो एक अरब डॉलर से ज़्यादा क़र्ज़ के कारण चीन को हम्बनटोटा पोर्ट ही सौंपना पड़ गया था. मालदीव में जिन प्रोजक्टों पर भारत काम कर रहा था उसे भी चीन को सौंप दिया गया है. मालदीव ने भारतीय कंपनी GMR से 511 अरब डॉलर की लागत से विकसित होने वाले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की डील को रद्द कर दिया था.


चीन सेंट्रल एशिया, दक्षिणी-पूर्वी एशिया और मध्य-पूर्व में अपना दबदबा बढ़ाने के लिए तीन ख़रब अमरीकी डॉलर से ज़्यादा की लागत वाली वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत आधारभूत ढांचा विकसित कर रहा है. इस परियोजना में ज़्यादातर पैसे चीन समर्थित विकास बैंक और वहां के सरकारी बैंकों से आ रहे हैं. द सेंटर फोर ग्लोबल डिवेलपमेंट का कहना है कि वन बेल्ट वन रोड में भागीदार बनने वाले सभी आठ देश जिबुती, किर्गिस्तान, लाओस, मालदीव, मंगोलिया, मोन्टेनेग्रो, पाकिस्तान और तजाकिस्तान चीनी क़र्ज़ के बोझ से दबे हुए हैं. चीन एशियाई देशों में ही नहीं बल्कि अफ़्रीकी देशों में भी आधारभूत ढांचा विकसित करने के काम में लगा है. उन्हीं देशों में एक देश है जिबुती. जिबुती में अमरीका का सैन्य ठिकाना है. चीन की एक कंपनी को जिबुती ने एक अहम पोर्ट दिया है जिससे अमरीका भी नाख़ुश है.
चीन पाकिस्तान में 55 अरब डॉलर अलग-अलग परियोजनाओं में ख़र्च कर रहा है. पाकिस्तान के बारे में कहा जा रहा है कि दबाव के बावजूद इस प्रोजेक्ट के अनुबंधों को सार्वजनिक नहीं किया गया है. विश्लेषकों का मानना है कि इस रक़म का बड़ा हिस्सा क़र्ज़ के तौर पर है. पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट भी उसके हाथ से निकलने के राह पर है. ग्वादर में पैसे के निवेश की साझेदारी और उस पर नियंत्रण को लेकर 40 सालों का समझौता है. चीन का इसके राजस्व पर 91 फ़ीसदी अधिकार होगा और ग्वादर अथॉरिटी पोर्ट को महज 9 फ़ीसदी मिलेगा. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार पाकिस्तान चीन का आर्थिक उपनिवेश बनता जा रहा है. द सेंटर फोर ग्लोबल डिवेलपमेंट की रिपोर्ट के अनुसार भी चीनी क़र्ज़ का सबसे ज़्यादा ख़तरा पाकिस्तान पर है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार जिबुती जिस तरह चीन से क़र्ज़ ले रहा है वो उसके लिए ही ख़तरनाक है. महज दो सालों में ही लोगों पर बाहरी क़र्ज़ उसकी जीडीपी का 50 फ़ीसदी से 80 फ़ीसदी हो गया है. इस मामले में दुनिया के कम आय वाले देशों में जिबुती पहला देश बन गया है. इसमें से ज़्यादातर क़र्ज़ चीन के एक्ज़िम बैंक के हैं.
मालदीव के सभी बड़े प्रोजेक्टों में चीन व्यापक रूप से शामिल है. चीन मालदीव में 830 करोड़ डॉलर की लागत से एक एयरपोर्ट बना रहा है. एयरपोर्ट के पास ही एक पुल बना रहा है जिसकी लागत 400 करोड़ डॉलर है. विश्व बैंक और IMF का कहना है कि मालदीव बुरी तरह से चीनी क़र्ज़ में फंसता दिख रहा है. मालदीव की घरेलू राजनीति में टकराव है और वर्तमान में मालदीव की सत्ता जिसके हाथ में है उसे चीन का विश्वास हासिल है.

दक्षिण-पूर्वी एशिया के ग़रीब मुल्कों में से एक लाओस में चीन वन बेल्ट वन रोड के तहत रेलवे परियोजना पर काम कर रहा है. इसकी लागत 6.7 अरब डॉलर है जो कि लाओस की जीडीपी का आधा है. IMF ने लाओस को भी चेतावनी दी है कि वो जिस रास्ते पर है उसमें अंतरराष्ट्रीय क़़र्ज़ हासिल करने की योग्यता खो देगा.
मंगोलिया में आधारभूत ढांचा के विकास हेतु चीन के एग्ज़िम बैंक ने 2017 की शुरुआत में एक अरब अमरीकी डॉलर का फंड देने पर सहमति हाइड्रोपावर और हाइवे प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी की शर्त पर दी थी. कहा जा रहा है कि वन बेल्ट वन रोड के तहत चीन अगले पांच सालों में मंगोलिया में 30 अरब डॉलर का निवेश करेगा. अगर ऐसा होता है तो मंगोलिया के लिए इस क़र्ज़ से बाहर निकलना आसान नहीं होगा.
विश्व बैंक का अनुमान है कि मोन्टेनेग्रो के लोगों पर क़र्ज़ उसकी जीडीपी का 83 फ़ीसदी पहुंच गया है. मोन्टेनेग्रो में बड़े प्रोजेक्ट पोर्ट विकसित करने और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क बढ़ाने के लिए 2014 में चीन के एग्ज़िम बैंक से एक समझौता हुआ था, जिसमें पहले चरण की लागत एक अरब डॉलर में 85 फ़ीसदी रक़म चीन देगा.
तजाकिस्तान की गिनती एशिया के सबसे ग़रीब देशों में होती है. IMF चेतावनी दे चुका है कि वो क़र्ज़ के बोझ तले दबा हुआ है. तजाकिस्तान पर भी सबसे ज़्यादा क़र्ज चीन का है. 2007 से 2016 के बीच तजाकिस्तान पर कुल विदेशी क़र्ज़ में चीन का हिस्सा 80 फ़ीसदी था.
किर्गिस्तान भी चीन के वन बेल्ट वन रोड परियोजना में शामिल है. किर्गिस्तान की विकास परियोजनाओं में चीन का एकतरफ़ा निवेश है. 2016 में चीन ने 1.5 अरब डॉलर निवेश किया था. किर्गिस्तान पर कुल विदेशी क़र्ज़ में चीन का 40 फ़ीसदी हिस्सा है.

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