भारत की विदेष मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने पिछले दिनों मांग की थी कि श्रीमद्भगवद्गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाय। हिन्दू समाज को अनुषासित और व्यवस्थित रखने में गीता का इस्तेमाल किया गया है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वाधीनता आंदोलन में गीता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मादरे-हिन्द यानी भारत माता के सपूतों और आजादी के दीवानों ने गीता की जबर्दस्त प्रेरणा से हंसते-हंसते अपनी जान दे दी।
हिन्दू धर्म में वेदों का स्थान सबसे उंचा है। ब्राह्मण ग्रन्थों, उपनिषदों, गीता, रामायण, महाभारत, पुराणों, धर्मषास्त्रों और धर्म सूत्रों का भी कम महत्व नहीं है। लेकिन हिन्दू समाज में श्रीमद्भगवद्गीता का असर सबसे ज्यादा है। गीता पवित्रतम वेदों से भी ज्यादा असरदार है।
आजादी मिलने के बाद धार्मिक उन्मादियों और कट्टरपंथी तत्वों ने गीता का इस्तेमाल राष्ट्रीय अखंडता और धर्म निरपेक्षता के खिलाफ किया। बहुत से धर्मान्ध हिन्दुओं ने हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ाने में गीता से पे्ररणा ली। मजदूर और श्रमिक वर्ग की एकता खत्म करने में गीता का इस्तेमाल हुआ है। इन सब बातों को देखते हुए यह आवष्यक है कि गीता को जनता के सामने पेष किया जाय। हिन्दू धर्म और दर्षन में गीता का बहुत उंचा स्थान है। श्रीमद्भागवद्गीता का संबंध महाभारत के युद्ध से है। महाभारत का युद्ध ईसा पूर्व 1000 से 900 के बीच हुआ था। गीता की रचना पहली और 7वीं षताब्दी के बीच हुई। यह स्वभाविक है कि ईसा पूर्व 1000 से लेकर 7वीं षताब्दी तक की घटनाओं और परम्पराओं की चर्चा गीता में हुई है।
गीता के किसी पहलू पर विचार करने से पहले हमें निम्नलिखित बातों को समझना आवष्यक है। धर्म क्या है? पाप और पुण्य क्या है? मोक्ष क्या है? पुनर्जन्म क्या है? ईष्वर का अवतार और धर्म क्या है? धर्म का मतलब है वर्णाश्रम धर्म। वर्णाश्रम धर्म का मतलब है वर्ण व्यवस्था यानी जाति व्यवस्था पर आधारित धर्म। समाज हमेषा अमीरों और मेहनतकषों में बंटा रहा है। सुविधा के ख्याल से हिन्दू षासक वर्गों ने समाज को चार वर्णों में बांट दिया था। ये वर्ण हैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैष्य और षुद्र। चाण्डाल भी हिन्दू समाज के अंग रहे हैं। पहले के दो वर्ण अमीरों के हैं। कभी-कभी वैष्यों का तबका भी अमीरों से सांठ-गांठ षासक वर्ग में षामिल हो जाता था। बाद के दो वर्ण मेहनतकष लोगों के थे। केवल षुद्र और चाण्डाल लोग मेहनतकष वर्ग में षामिल थे। यद्यपि उस जमाने में आजकल की तरह वर्गों का बंटवारा नहीं हुआ था। इन चारों वर्गों के लोगों को सवर्ण (हिन्दू) कहा जाता है। वर्ण व्यवस्था के बाहर भी हिन्दुओं का एक तबका है। इस तबके के पुराने जमाने में चाण्डाल, ष्वपच, अन्त्यज या अन्त्यवासिन के नाम से जाना जाता था। आजकल इसे दलित कहा जाता है। ये लोग अवर्ण कहलाते हैं। वर्णों से अनेक जातियां बनीं। सारा समाज सैकड़ों उंची-नीची जातियों में बंट गया। हर जाति (वर्ण) का काम निर्धारित था। जाति में पैदा हुए व्यक्ति को उस जाति के काम को ही करना होता था। इस कठोर व्यवस्था से वह उस जाति में बना रहता था। उसी जाति में मरता था। जाति के सदस्य की हैसियत के नाते ही उसे कर्तव्य और अधिकार हासिल थे। यदि जाति को सौंपा गया काम कोई आदमी नहीं करता था तो उसे जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। वह सारे अधिकारों से वंचित हो जाता था। समाज की नजर में उसका महत्व नहीं था। वह मृतप्राय था। उंचे वर्ण का आदमी यदि जाति व्यवस्था के खिलाफ काम करता था तो उसे नीचे वर्ण में ढकेल दिया जाता था। कहने का मतलब है कि जाति व्यवस्था के अनुसार कर्तव्य नहीं करने से आदमी का पतन और विनाष हो जाता था। इस वर्ण (जाति) व्यवस्था को कायम और बरकरार रखने के लिए एक धर्म बना और विकसित हुआ। यही धर्म गीता, उपनिषदों, पुराणों जैसे ग्रन्थों का धर्म है। यही हिन्दू या सनातन धर्म कहलाता है। गीता में धर्म का मतलब हिन्दू धर्म से है। यही गीता का स्वधर्म है।
हिन्दू धर्म का तात्पर्य वर्ण (जाति) व्यवस्था से है। समाज को तो विभिन्न वर्गों में बांट ही दिया गया था, इन्सान के पूरे जीवन को अनेक संस्कारों से भर दिया गया था। जन्म से लेकर मृत्यु तक नाना प्रकार के कर्मकांड इन्सान को करने पड़ते हैं। मनुष्य की सारी उम्र चार भागों में सिद्धान्तकारों ने बांट दी थी। इसे आश्रम धर्म कहा जाता है। पहली अवस्था ब्रह्मचर्य की थी जिसमें विद्या और षिक्षा हासिल करनी थी। दूसरी अवस्था गृहस्थ आश्रम थी जिसमें धनोपार्जन करना था। तीसरी अवस्था वानप्रस्थ कहलाती थी। चैथी सन्यास की। गौतम, आपस्तम्ब और बौधायन ने मनुष्यों के जीवन को इस तरह से बांध दिया है कि उन्हें अन्य चीजों के बारे में सोचेन का मौका ही नहीं मिले। आश्रम धर्म के उल्लंघन से सर्वनाष हो जाता- ऐसा भय सिद्धांतकारों ने पैदा कर रखा था।
प्रथमे नार्जिता विद्या द्वितीये नार्जितं धनम्।
तृतीये नार्जितं पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यति।।
(जिसने ब्रह्मचर्य अवस्था में विद्या, गृहस्थ अवस्था में धन, वानप्रस्थ अवस्था में पुण्य नहीं प्राप्त किया, वह सन्यास अवस्था में कुछ नहीं कर सकता- यानी उसे मोक्ष नहीं मिला सकता।) वर्ण (जाति) व्यवस्था और आश्रम धर्म से पूरे हिन्दू समाज को इस कदर बांध दिया गया था कि समाज हिल-डुल नहीं सकता था। समाज गुलामी की जंजीरों से जकड़ जाता था। वह बिल्कुल थम गया था। इसकी गति और षक्ति समाप्त हो गयी थी। यही वर्णाश्रम धर्म है। यही गीता का स्वधर्म है। यही हिन्दू धर्म है। जाति के बिना हिन्दू धर्म की कल्पना नहीं हो सकती है।
उपनिषदों के अनुसार हर आदमी कई जन्म लेता है। मरता है। दूसरे जन्म में पैदा होता है। अगर इस जन्म में उसने पाप किया है तो दूसरे जन्म में वह जानवर हो सकता है। मतलब यह है कि जाति व्यवस्था का उल्लंघन (पाप) किया जायेगा तो मनुष्य को बहुत बुरी (पाप) योनि में जन्म लेना होगा। यदि जाति व्यवस्था का पालन (धर्म) किया जायेगा, तो आदमी दूसरे जन्म में उंचे वर्ण में पैदा होगा। हर प्राणी के षरीर में एक आत्मा निवास करता है जो उसे जीवित रखता है। यह आत्मा अजर-अमर है। यह कभी मरती नहीं है। यह अनादि है। यह कभी पैदा नहीं हुआ है। यह हमेषा से है। जब कोई प्राणी मरता है तो आत्मा उसके षरीर से निकलकर दूसरे षरीर में चली जाती है। वह दूसरा षरीर धारण करती है। यही पुनर्जन्म कहलाता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त आत्मा के अमरत्व के सिद्धांत पर आधारित है। जो व्यक्ति वर्ण (जाति) व्यवस्था का उल्लंघन करता है वह अधर्म करता है। वह पापी होता है। वर्ण व्यवस्था गैर बराबरी पर आधारित है। उंची जातियां नीची जातियों को छोटा और गुलाम समझती है। जाति व्यवस्था बराबरी, भाईचारे और लोकतंत्र के सिद्धान्त के खिलाफ है। जहां छोटे-बडे़ का सवाल होगा वहां आपस में प्रेम, ममता, इन्सानियत और भाईचारे का अभाव रहेगा। यही हिन्दू धर्म का कलेवर है। हिन्दू धर्म गुलामी और षोषण का प्रतीक है। इस धर्म को लागू करने के लिये ईष्वर चिन्तित रहता है। यदि कोई इसका उल्लंघन करता है या उसे नष्ट करता है तो जाति व्यवस्था को फिर से लागू करने के लिए ईष्वर मनुष्य के रूप में अवतार लेता है। ईष्वर द्वारा मनुष्य के रूप में जन्म लेना ईष्वर का अवतार कहलाता है। गैर बराबरी और गुलामी पर हस समय भगवान का पहरा रहता है। गीता का भगवान षोषण पर आधारित व्यवस्था को कायम रखने के लिए हमेषा चैकस रहता है। इस धर्म का पालन करने के लिए सिद्धांतकारों ने इंद्रियों को नियंत्रण में रखने और दमन करने का हुक्म दिया है।
व्यक्ति को जब तक मोक्ष नहीं मिल जाता है उसे अपने किये पाप अथवा पुण्य के अनुसार पैदा होना और मरना पड़ता है। हिन्दू धर्म के अनुसार 84 लाख योनियां है जिनमें वह जन्म लेता है। जन्म-मरण के बन्धन से छुटकारा पाने को मोक्ष कहा जाता है। मोक्ष प्राप्त हो जाने पर जीवात्मा को आवागमन से मुक्ति मिल जाती है। फिर उसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता है। उस हालात में आत्मा परम तत्व यानी ब्रह्म में मिल जाता है। यही मोक्ष कहलाता है। उपनिषदों में मोक्ष प्राप्त करने के लिए ज्ञान मार्ग का रास्ता बतलाया गया है। यह ज्ञान मार्ग बहुत ही कठिन है।
’’ क्षुरस्य धारा निषिता दुरत्यया
दुर्गमपथस्तत्कवयो वदन्ति।।’’
यानी (ज्ञान पन्थ कृपानु के धारा। परत खगेष न नागहिं बारा।।)  (रामचरित मानस)
ज्ञान मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने के समान है। यह बड़ा ही दुर्गम रास्ता है। ऐसा ज्ञानी लोग कहते हैं। बहुत उंचे दर्जे का आदमी ही इस रास्ते पर चल सकता है। यह केवल गीता का स्थितप्रज्ञ व्यक्ति ही कर सकता है। हकीकत में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति केवल उंचे वर्ण का आदमी ही हो सकता है। मोक्ष उसी व्यक्ति को प्राप्त हो सकता है जो हुकूमत करने वाले वर्ण का सदस्य हो।
वेदों को किसी निराकार ईष्वर की जानकारी नहीं है। वेदों में अनेक देवी-देवताओं की चर्चा की गयी है। वेदों के देवता अवतार नहीं लेते थे। वेदों में पुनर्जन्म की बात नहीं है। मोक्ष की धारणा भी वेदों में नहीं है। वेदों के पुरोहित सांसारित हुआ करते थे। वे खाना-पीना और परिवार के लोगों के साथ रहना पसन्द करते थे। वे जंगलों में नहीं रहना चाहते थे। ऋग्वेद के निम्नलिखित मंत्र से यह बात स्पष्ट है-
अपाम सोमममृता-भवेम।
(हम दूध और मधु मिले हुए भांग के प्याले को पीकर अमर हो गये।) इसी तरह वेदकाल के ऋषि बच्चों को नातियों के साथ रहना ज्यादा पसंद करते थे।
’’क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानैः स्वे दमे।’’
(बच्चों और नातियों के साथ खेलना बहुत आनंददायक है।) उस जमाने में जंगल में रहकर तपस्या करना, उपवास रखकर भूले रहना लोग नहीं पसन्द करते थे। आत्मा परमतत्व, ब्रह्म और ईष्वर की धारणा वेदों में नहीं थी। पहले वेदों की रचना हुई। इसके बाद ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हुई। उपनिषदों की रचना ब्राह्मण ग्रन्थों के बाद हुई।
वेदों का पुरोहित वर्ग सांसारिक था। उसे खाने-पीने वाली और इच्छी चीजों की जरूरत थी। वह किसी ऐसे ईष्वर की कल्पना नहीं कर सकता था जो न खाता हो, न पीता हो, न दिखाई देता हो और बिना किये ही सारे काम पूरे करता हो। निराकार ईष्वर के पैर नहीं हैं। लेकिन चलता है। हाथ नहीं हैं किन्तु सब काम करता है। बिना नेत्र के देखता है और बिना कान के सुनता है।
’’अपाणिपादौजवनोगृहीता प्ष्चत्यचथुः सश्रणोत्यकर्णः।’’
मतलब हुआ- बिनु पद चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु करम करई विधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु वाणी बड़ जोगी।।
तन बिनु परसु नयन बिनु देखा। ग्रहै धान बिनु बास विसेखा।।
ऐसे ईष्वर की पैदाइष वेदों में नहीं हुई। निराकार ईष्वर, ब्रह्म, परमतत्व, आत्मा, मोक्ष, अवतार, पुनर्जन्म, स्वर्ग, नरक- ये सब चीजें क्षत्रिय राजन्यों के दिमाग की उपज थी। ब्राह्ामण पुरोहितों ने यज्ञ विधानों के लिए ब्राह्मण ग्रंन्थों की रचना की थी। इसके जवाब में क्षत्रिय विद्वानों ने उपनिषदों की रचना कर डाली। उन्होंने उपनिषदों में आत्मा, परमतत्व, मोक्ष, निराकार, ईष्वर, अवतार आदि मनगढ़ंत चीजों की कल्पना कर डाली। इसका मतलब है कि ईष्वर परमतत्व, ब्रह्म आत्मा- ये हैं ही नहीं। क्योंकि यदि ईष्वर, आत्मा, ब्रह्म, परमतत्व हमेषा से षास्वत रहे होते तो वेदों में इनका वर्णन जरूर मिलता। निराकार ईष्वर और ब्रह्म की खोज हिन्दू दर्षन का चमत्कार है। इनकी रचना ब्राह्मणों ने नहीं, बल्कि क्षत्रियों ने की थी। उपनिषदों के रचयिता क्षत्रिय थे। क्षत्रियों और ब्राह्मणों में लंबे समय तक संघर्ष चला।
क्षत्रियों ने अपनी धन-दौलत, हुकूमत और भोग विलास की सुरक्षा के लिए ईष्वर, अवतार, आत्मा, परमतत्व और मोक्ष की मनगढ़न्त और कपोल कल्पित बातें उपनिषदों में लिखीं। ये उपनिषद हिन्दू दर्षन की आधारषिला माने जाते हैं।
यद्यपि सर्वोच्चता हासिल करने के लिए पुरोहित वर्गों और क्षत्रियों में संघर्ष होता रहा। ब्राह्मणों ने ब्राह्मण ग्रन्थ लिखे। इसके जवाब में क्षत्रियों ने उपनिषदों की रचना की। उपनिषदों के जवाब में पुरोहित वर्ग ने षड्दर्षन की रचना कर डाली। इस तरह संघर्ष चला। किन्तु मेहनत करने वाले लोगों के खिलाफ षासक वर्गों ने दोनों वर्गों क्षत्रियों और पुरोहितों में एका हो जाता था। वैष्य भी उनकी खुषामद करते थे। वैष्य लोग षुद्रों और चाण्डालों पर रौब गांठते थे। ये तीनों वर्ण एक होकर मेहनत करने वाले लोगों की कमाई खाते थे।
गीता उपनिषदांे का निचोड़ है। बहुत से विद्वान गीता को भी उपनिषद कहते हैं। यद्यपि इसे अन्तिम उपनिषद माना जाता है। गीता में सभी उपनिषदों का सारतत्व है। स्वर्ग-नरक कहीं नहीं है। सामन्त काल में किसी विलासी राजा के दरबार की कल्पना स्वर्ग के रूप में कर ली गयी। यह धारणा है कि स्वर्ग में कोई मरता नहीं है। खाने को अच्छी चीजें और पीने की अच्छी षराब वहां मिलती है। खूबसूरत औरतों का वहां नाच होता रहता है। मानसिक रूप से जर्जर जनता को डराने के लिये नरक की कल्पना की गयी। नरक कहीं नहीं है। अत्यन्त कू्रर और विलासी राजाओं की जेलों, सामन्तों और उनके लठैतों द्वारा गरीबों के उत्पीड़न और अत्याचार को नरक के रूप में पेष किया गया।

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