कावेरी विवाद पर SC के फैसले को लागू कराने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार पर

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच चल रहे कावेरी नदी जल विवाद पर तमिलनाडु को 177.25 TMC और कर्नाटक को 285 TMC पानी देने का फैसला सुनाया.
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अमिताव रॉय और ए.एम. खानविलकर की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि नदी पर कोई राज्य दावा नहीं कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि कावेरी के जल में कर्नाटक का हिस्सा इस तथ्य को देखकर बढ़ाया जा रहा है कि बीते दिनों में बेंगलुरु में पीने के पानी की मांग बढ़ी है. साथ ही इंडस्ट्रियल इलाकों में भी पानी की खपत में इजाफा देखा गया है.
कर्नाटक पानी की मात्रा बढ़ाए जाने से खुश है तो तमिलनाडु ने इसका वैकल्पिक रास्ता ढूंढने की बात कही है. तमिलनाडु पक्ष के वकील एन कृष्णा ने कहा कि हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन पानी की मात्रा राज्य के लिए पर्याप्त नहीं है. पानी की कमी को लेकर हमने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से भी मुलाकात की थी.
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सुप्रीम कोर्ट का फैसले पर खुशी जताई है. फैसले से पहले कर्नाटक में सुरक्षा-व्यवस्था चाक-चौबंद कर दी गई थी, बंगलूरू और मैसूर में करीब दस हजार जवानों को तैनात किया गया था. हाँलाकि तमिलनाडु में भी सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी की गयी थी.
कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल ने साल 2007 के फरवरी महीने में कावेरी ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती दी थी. कर्नाटक चाहता है कि तमिलनाडु के लिए नदी के जल का आवंटन कम किया जाए तो वहीं तमिलनाडु भी कर्नाटक के लिए ऐसा ही चाहता था. साल 2007 में ट्रिब्यूनल के फैसले में तय हुआ था कि तमिलनाडु को 419 टीएमसी, तमिलनाडु को 270 टीएमसी, केरल को 30 टीएमसी और पुडुचेरी को 7 टीएमसी पानी दिया जाए. क्योंकि सभी राज्य कह रहे थे कि उन्हें जरूरत के अनुसार कम पानी मिलता है.
अंतिम सुनवाई में कर्नाटक ने कहा था कि 1894 और 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी के साथ जल समझौता किया गया था. 1956 में बने नए राज्य की स्थापना के बाद इस करार के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है और तमिलनाडु को सिर्फ 132 टीएमसी पानी आवंटित किया जाना चाहिए. कर्नाटक की इस दलील पर तमिलनाडु का कहना था कि हमें हर बार पानी के दावे के लिए कोर्ट से गुहार लगानी पड़ी है. कर्नाटक को 55 टीएमसी फीट पानी आवंटित किया जाना चाहिए.


भारतीय संविधान के अनुसार कावेरी एक अंतर्राज्यीय नदी है. इसलिए कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों ही इस पर अपना हक जता रहे थे, लेकिन इस घाटी का एक हिस्सा केरल में भी पड़ता है और समुद्र में मिलने से पहले ये नदी कराइकाल से होकर गुजरती है, जो पुडुचेरी का हिस्सा है. इसलिए इस नदी के जल के बंटवारे को लेकर इन चारों राज्यों में विवाद का एक लंबा इतिहास रहा है. 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर राज के बीच ही यह विवाद था और दोनों के बीच पानी को लेकर समझौता हुआ था लेकिन बाद में इस विवाद में केरल व पुडुचेरी भी शामिल हो गए जिससे यह विवाद और गहरा गया.
विवाद की असली जड़ मद्रास-मैसूर एग्रीमेंट 1924 को माना जाता है. तमिलनाडु ने विवाद के निपटारे के लिए जुलाई 1986 में अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) के तहत इस मामले को सुलझाने के लिए आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार से एक न्यायाधिकरण के गठन किए जाने का निवेदन किया था. 2 जून 1990 को केंद्र सरकार ने एक ट्रायब्यूनल बनाया. 1991 में न्यायाधिकरण ने एक अंतरिम आदेश पारित किया जिसमें कहा गया था कि कर्नाटक कावेरी जल का एक तय हिस्सा तमिलनाडु को देगा पर हर महीने कितना पानी छोड़ा जाएगा इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ.
इस बीच तमिलनाडु इस अंतरिम आदेश को लागू करने के लिए जोर देने लगा और इस आदेश को लागू करने के लिए एक याचिका भी उसने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की पर तबसे मामला और पेचीदा ही होता गया. जल बंटवारे को लेकर साल 2007 में कावेरी वॉटर डिसप्यूट ट्रायब्यूनल के फैसले के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल ने सुप्रीम कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई थी. 5 सितंबर 2016 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद इन प्रदेशों के बीच खटपट तब और बढ़ गई जब अदालत ने कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह लगातार दस दिन तक तमिलनाडु को 15 हजार क्यूसेक पानी सप्लाई करे. मामले के सियासी परिणामों को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने कावेरी ट्रायब्यूनल के आदेश में रद्दोबदल के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई. अब कोर्ट के फैसले को लागू करना- कराना केंद्र का काम है.

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