कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने लिंगायत को दिया अलग धर्म का दर्जा

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सिद्धारमैया सरकार ने सोमवार को लिंगायत को एक अलग धर्म का दर्जा देते हुए केंद्र सरकार से कैबिनेट के इस प्रस्ताव को क़ानूनी दर्जा देने की मांग की है. हालांकि कर्नाटक कैबिनेट की बैठक में इसे लेकर काफी नोंकझोंक भी हुई हुयी. चार लिंगायत मंत्रियों में से दो इस फैसले के विरोध में थे.
कर्नाटक की सड़कों पर भी विरोध और समर्थन दोनों दिखा. लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा मिलने की खुशी में जश्‍न मनाया गया तो कई जगह इस फैसले का समर्थन और विरोध कर रहे लोग आपस में भिड़ गए.
निर्णय के बाद राज्य सरकार के मंत्री और लिंगायत नेता एमबी पाटिल ने कहा कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने ऐतिहासिक फैसला लिया है. कैबिनेट ने लिंगायतों और वीरशेवाये के उन लोगों को अलग धर्म का दर्जा देने का फैसला किया है जो लॉर्ड बसवा के मानने वाले हैं. हम कैबिनेट के इस फैसले को केंद्र को मंजूरी के लिए भेज रहे हैं.
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कर्नाटक में लिंगायतों की संख्या तक़रीबन 19 फीसदी है और ये राज्य की करीब 100 सीटों पर असरकारक हैं. 1980 के दशक में लिंगायतों के नेता जनता दल के रामकृष्ण हेगड़े हुआ करते थे, बाद में यह समुदाय कांग्रेस के वीरेंद्र पाटिल के साथ हो गया था. राजीव गांधी ने 1990 में वीरेंद्र पाटिल को एयरपोर्ट पर बुलाकर मुख्‍यमंत्री पद से इस्तीफा देने का आदेश दिया था, जिसे लिंगायतों का अपमान माना गया था और फिर से कांग्रेस की पकड़ लिंगायतों पर कमज़ोर पड़ती गयी और वे बीजेपी के साथ जुड़ते गये तथा लगभग तीन दशकों से वो बीजेपी का समर्थन करते रहे हैं.
12वीं सदी के संत और विचारक वस्वन्ना ने एक ऐसे विचारधारा की नींव रखी जो कर्म प्रधान हो यानी उन्होंने वीरशैव पद्धति का विरोध किया. संत वस्वन्ना ने पिछड़ी जातियों और दलितों को एक साथ सामाज में एक ही पंक्ति में ला खड़ा किया. वो ऐसे समाज के पक्षधर थे जो धर्म प्रधान न होकर कर्म प्रधान हो. संत वस्वन्ना ने जिस पंथ (लिंगायत) की स्‍थापना की वह मनुवाद, जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था, सती प्रथा और बाल विवाह का विरोध करता है. ज्ञात है कि 224 सदस्यों वाली राज्य की विधानसभा में 52 विधायक लिंगायत हैं.

दस्तावेज़ों के हवाले से माना जाता है कि लंबे अरसे से लिंगायत अलग धर्म के तौर पर अपने को मान्यता देने की मांग करते रहे हैं. कई उतार चढ़ाव के के बाद जब 50 के दशक में कर्नाटक वजूद में आया था तो ये मांग एक बार फिर तेज़ हुई थी. 2017 में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने के अपने वायदे के आलोक में कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व जज एच एन नागमोहन दास की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय एक्सपर्ट समिति बनाई जिसने चंद दिनों पूर्व लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने का सिफारिश किया. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सिद्धारमैया ने लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का दांव खेला. अब यह प्रस्ताव अंतिम मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा.
बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार बीएस येदियुरप्पा भी लिंगायत हैं, कांग्रेस इस फैसले से येदियुरप्पा और बीजेपी को घेरना चाहती है. बीजेपी लिंगायतों को हिंदू धर्म का ही हिस्सा मानती रही है, ऐसे में बीजेपी को इस दांव की काट खोजनी पड़ेगी. जबकि चुनाव में अब समय काफी कम बचा है. उधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी पिछले ही महीने उत्तर कर्नाटक के लिंगायत बहुल इलाकों के दौरे पर जाने के क्रम में उनके मठों में भी गए थे.
सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए वीरशैव लिंगायत समित के अध्यक्ष सी हिरेमठ ने कहा कि हम शुरू से ही नागमोहन कमेटी के खिलाफ थे. उन्हें कर्नाटक के अलग-अलग धर्मों की समझ नहीं है, हम इसका कड़ा विरोध करते हैं.
कर्नाटक सरकार के लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने के फैसले से नाराज़ बीजेपी के राज्य प्रवक्ता एस प्रकाश ने कहा कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया काफी दिनों से लिंगायत समाज को बांटने में जुटे थे. अब केंद्र को फैसला लेना है लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि इस चाल से सिद्धारमैया को फायदा नहीं होगा.

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