एक साथ चुनाव कराने की कवायद तेज, 2018 से हो सकती है शुरुआत

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लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराए जाने की मांग अलग-अलग समय पर उठती रही है। वर्तमान प्रधानमंत्री व बीस दिन पूर्व तक देश के राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी भी इसके पक्ष में अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं।
भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में तमाम विवादों और कलहों के बाद भी देश के लोगों का भरोसा इस व्यवस्था पर 70 वर्षीं से लगातार बरकरार है, यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है। चुनाव प्रक्रिया के जरिए देशवासी संसद या राज्यों की विधानसभाओं के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और अपना समर्थन या आक्रोश शांतिपूर्ण ढंग से रखते हैं। यह चुनावी प्रक्रिया देश के किसी न किसी हिस्से में निरंतर चलती ही रहती है। इस कवायद से न केवल विकास प्रक्रिया पर कुप्रभाव पड़ता है, बल्कि देश पर आर्थिक बोझ भी पड़ता है। चुनावों को एक साथ कराने की मांग अलग-अलग समय पर उठती रही है।
जनवरी 2017 में राष्ट्रीय मतदाता दिवस के मौके पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से सरकारों के पास कामकाज के लिए पर्याप्त समय होगा। उन्होंने चुनाव आयोग से कहा था कि वो इस संदर्भ में सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश करें, ताकि आम सहमति बनायी जा सके।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने की बात कई मौकों पर कह चुके हैं। 31 दिसंबर 2016 को राष्ट्र के नाम संबोधन में भी PM ने कहा था कि विकास के पहिए में गति बरकरार रहे इसके लिए जरूरी है कि देश में चुनावी प्रक्रिया एक साथ ही पूरी की जाए। ऐसा करने से आम लोगों के लिए सरकारों के पास पर्याप्त समय होगा। इसके पूर्व अप्रैल 2016 में मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायधीशों के दिल्ली सम्मेलन में भी PM ने एक साथ चुनाव कराने का जिक्र किया था।
PM ने कहा था कि ज्यादातर दल उनसे कह रहे हैं कि चुनावों की वजह से बहुत वक्त बर्बाद होता है और चीजें रुक जाती हैं। आचार संहिता की वजह से 40-50 दिन तक फैसले लंबित रहते हैं। सार्वजनिक मंच पर प्रधानमंत्री ने पहली बार जब इस मुद्दे को उठाया तो लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन का भी उन्हें समर्थन मिला था, जिन्होंने कहा कि इससे समय और धन दोनों बचेगा।


नीति आयोग ने भी 2024 से लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराए जाने के पक्ष में अपनी रिपोर्ट दी थी। आयोग के अनुसार इसे यथार्थ रूप देने के लिए कुछ राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में थोड़ी बहुत बढ़ोतरी और कुछ के कार्यकाल में कटौती करनी होगी। साथ ही संविधान के अनुच्छेदों में संशोधन कर दोनों सदनों में पारित कराना होगा।
चुनावों को एक साथ कराने के तर्क को इस बात से भी बल मिलता है कि विधि आयोग ने भी अपनी 170वीं रिपोर्ट में इसका समर्थन किया। आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने के लिए करीब 14 लाख नए EVM की जरूरत होगी। इसके लिए सरकार ने चुनाव आयोग को 1009 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के अनुसार पहली चार लोकसभाओं और विधानसभाओं के चुनाव 1952, 1957, 1962 और 1967 में एक साथ ही हुए थे। उसके बाद दल बदल या किसी और वजह से किसी विधानसभा की सरकार गिर गई और विधानसभा का चुनाव पहले कराना पड़ा और अलग-अलग विधानसभा के चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे। 1971 में इंदिरा गांधी ने लोकसभा समय से पहले भंग कर दी थी और तब से इसका सिलसिला टूट गया। संविधान आयोग और कश्यप का निजी मत भी ये है कि चुनाव एक साथ हों लेकिन दो-तीन झटकों या फिर एक प्रक्रिया के तहत हो। इसमें कोई संविधानिक कठिनाई नहीं है क्योंकि संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि कभी भी किसी भी विधानसभा या लोकसभा का विघटन किया जा सकता है।
देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हों। इस विषय पर सभी दलों के बीच सार्वजनिक बहस हो तथा चुनाव आयोग के पास सभी दलों को अपना पक्ष रखना चाहिए।

भारत में एक साथ चुनाव कराने की मांग सबसे पहले लालकृष्ण आडवाणी ने रखी थी। उनकी बात का समर्थन पूर्व चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा ने भी किया था, जिनका मानना था कि इससे सरकार के खर्चे में कमी आएगी तथा प्रशासनिक कार्यकुशलता में भी बढ़ोतरी होगी। भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी कहा था कि बार-बार चुनाव कराने से सरकार का सामान्य कामकाज ठहर जाता है।
मध्य प्रदेश में नवंबर 2013 में विधानसभा चुनाव हुए, फिर लोकसभा चुनाव, इसके तुरंत बाद नगर निकाय और फिर पंचायत चुनाव के कारण आदर्श आचार संहिता लगी रही। चुनावों के चलते 18 महीनों में नौ महीने आदर्श आचार संहिता के कारण सरकारी कामकाज कमोबेश ठप सा रहा।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, केरल, तमिलनाडु समेत देश के 18 राज्य एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में सैद्धांतिक रूप से हैं। वहीं व्यवहारिक मुश्किलों को दूर कर लिया जाए तो भाजपा, असम गण परिषद, कांग्रेस, डीएमके, एआईडीएमके व इंडियन मुस्लिम लीग जैसी कई पार्टियां भी लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का वैचारिक समर्थन करती हैं।
चुनावों की निरतंर चलती प्रक्रिया की वजह से देश के किसी न किसी कोने में आदर्श आचार संहिता लगी रहती है, जिससे योजनाएं प्रभावित होती हैं। अगर चुनाव एक साथ करा लिए जाते हैं तो सरकारी काम बाधित नहीं होते। सरकारी अधिकारियों, शिक्षकों व कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी लगती है, जिससे बच्चों की पढ़ाई व प्रशासनिक कार्य प्रभावित होते हैं उससे निजात मिलेगा। एक साथ लोकसभा व विधानसभा चुनाव होने पर सरकारी मशीनरी की कार्य क्षमता बढ़ेगी तथा आम लोगों को इससे फायदा होगा। दोनों चुनावों को एक साथ कराने पर सरकारें बार- बार लोकलुभावन वादे करने से बचेंगी। साथ ही राजनीतिक स्थिरता का दौर शुरू होगा, जिससे विकास-कार्यों में तेजी आएगी।
चुनावों में होने वाले खर्च की बात की जाये तो 2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय खजाने से 3426 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, वहीं राजनीतिक दलों द्वारा 2014 में लगभग 26,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। जबकि 2009 लोकसभा चुनाव में सरकारी खजाने से 1483 करोड़ रुपये खर्च हुआ था। चुनाव आयोग के अनुसार विधानसभाओं के चुनावों में लगभग 4500 करोड़ रुपये का खर्च आया है, जो अगली बार और बढ़ेगा। एक साथ चुनाव कराए जाने पर इस खर्च में काफी हद तक कमी आयेगी। वैसे भी 1952 के चुनाव में प्रति मतदाता खर्च 60 पैसे था, जो साल 2009 में बढ़कर 12 रुपये पहुंच गया।
दिसंबर 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम में मौजूदा सरकारों का कार्यकाल पूरा हो रहा है। साथ ही अप्रैल 2019 में तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। नियमों के मुताबिक कार्यकाल समाप्त होने से 6 महीने पहले चुनाव कराए जा सकते हैं। ऐसे में 2018 में लोकसभा के साथ साथ सात राज्यों में तो एक साथ चुनाव आसानी से कराए ही जा सकते हैं।

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