19 मई को रानी लक्ष्मी बाई की 175वीं मैरिज एनिवर्सिरी थी। झांसी के गणेश मं‍दिर में राजा गंगाधर राव से शादी के बाद उनका नाम मण‍िकर्ण‍िका से बदलकर लक्ष्मी बाई रख दिया गया और वह झांसी की रानी बन गईं।
1613 में ओरछा के राजा वीर सिंह द्वारा बनवाए गए इस किले को 400 साल हो गए हैं। कई मराठा शासकों का झांसी में शासन रहा, लेकिन किले को रानी के नाम से जाना जाता है। रानी की वीरता की कहानी किला सहेजे है। अंग्रेजों से खुद को घिरता देख लक्ष्मी बाई ने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ से बांध अपने ढाई हजार की कीमत के सफेद घोड़े पर बैठ किले की 100 फीट ऊंची दीवार से छलांग लगाई थी।

झांसी के पुरानी बजरिया स्थित गणेश मंदिर की रानी लक्ष्मीबाई की जिंदगी में सबसे अहम जगह थी। 15 साल की उम्र (जानकारों के मुताबिक रानी का जन्म 1827 है) में मनु कर्णिका की शादी इसी मंदिर में झांसी के राजा गंगाधर राव से हुई थी। शादी के बाद इसी मंदिर में उनका नाम मनु कर्ण‍िका से लक्ष्मीबाई पड़ा।
राजा गंगाधर राव के निधन के बाद रानी गम में डूब गई थीं। गंगाधर राव का क्रिया कर्म जहां किया गया था, उसी लक्ष्मीताल के किनारे रानी ने राजा की याद में उनकी समाधि बनवाई थी। झांसी में रानी ने सिर्फ यही एक निर्माण करवाया था। इसे गंगाधर राव की छतरी के नाम से जानते हैं।

कहा जाता है कि रानी लक्ष्मी बाई महा लक्ष्मी मंदिर में पूजा करने के जाती थीं, तब इसी तालाब से होकर गुजरती थीं। यह झांसी का बड़ा जल श्रोत था। निधन के बाद गंगाधर राव का अंतिम संस्कार भी यहीं किया गया, उन्हें श्रद्धांजलि देने लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। आज इस तालाब की हालतखराब हो चुकी है। इसे संवारने के लगातार कोश‍िश की जा रही है।

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