सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या भूमि विवाद का हल मध्यस्थता के जरिए निकालने का फैसला सुनाते हुए रिटायर्ड जस्टिस इब्राहिम खलीफुल्लाह की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मध्यस्थता कमेटी का गठन कर दिया, जिसमें श्रीश्री रविशंकर और श्रीराम पंचू शामिल हैं.
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में संविधान पीठ ने इस मामले में बुधवार को सुनवाई के दौरान सभी पक्षों से मध्यस्थता के लिए नाम मांगे थे और मध्यस्थता मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. पीठ में जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर शामिल हैं.
संविधान पीठ ने मध्यस्थता के लिए कुल आठ हफ्तों का समय निर्धारित किया है. कोर्ट ने कहा कि 4 सप्ताह में पक्षकारों के बीच मध्यस्थता कर विवाद का निपटारा करें. पैनल एक हफ्ते में मध्यस्थता के जरिए विवाद निपटाने का प्रयास शुरू कर दे. चार हफ्ते में मध्यस्थता की स्थिति को लेकर प्रगति रिपोर्ट दायर करे और आठ हफ्ते में मध्यस्थता की प्रक्रिया खत्म हो जानी चाहिए. मध्यस्थता की कार्यवाही फैजाबाद में होगी तथा कोर्ट ने मध्यस्थता प्रयासों के दौरान मीडिया रिपोर्टिंग पर पूरी तरह से रोक भी लगायी है.
इससे पहले 26 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में मध्यस्थ के जरिए विवाद का समाधान निकालने पर सहमति जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि एक फीसदी गुंजाइश होने पर भी मध्यस्थ के जरिए मामला सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए। पीठ ने मध्यस्थता पैनल के नाम अपनी तरफ से दिए, इससे पहले बुधवार को उसने सभी पक्षों से नाम मांगे थे, लेकिन सभी ने नाम नहीं दिए. तब बातचीत के जरिए हल निकालने को लिए मध्यस्थता मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था.
हिंदू पक्षकारों की दलील थी कि अयोध्या मामला धार्मिक और आस्था से जुड़ा मामला है, यह केवल सम्पत्ति विवाद नहीं है. इसलिए मध्यस्थता का सवाल ही नहीं है. निर्मोही अखाड़े ने कहा था कि वह मध्यस्थता के लिए तैयार है. मुस्लिम पक्ष ने भी मध्यस्थता पर सहमति जताई. पीठ ने कहा कि हम हैरान हैं कि विकल्प आज़माए बिना मध्यस्थता को खारिज क्यों किया जा रहा है? अतीत पर हमारा नियंत्रण नहीं है लेकिन हम बेहतर भविष्य की कोशिश तो जरूर कर सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 सितंबर 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर विचार कर रही है. साथ ही सुनवाई में केंद्र की वो याचिका भी शामिल है, जिसमें केंद्र सरकार ने गैर विवादित जमीन को उनके मालिकों को लौटाने की मांग की है. सर्वोच्च न्यायालय ने 9 मई 2011 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगायी थी और तब से मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

पीठ ने कहा कि अगर मध्यस्थों को लगता है कि इस पैनल में कुछ अन्य लोगों को शामिल किया जाना चाहिए तो वो उन्हें शामिल कर सकते हैं और आवश्यकतानुसार कानूनी सहायता ले सकते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार को फ़ैज़ाबाद में मध्यस्थों को सभी सुविधाएं अविलम्ब प्रदान करने का आदेश भी पीठ ने दिया. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में मध्यस्थता की पूरी कार्यवाही ऑन-कैमरा गोपनीय तरीके से होगी. जिसकी कोई मीडिया रिपोर्टिंग नहीं होगी.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्यस्थता कमेटी के चेयरमैन पूर्व जस्टिस फकीर मुहम्मद इब्राहिम खलीफुल्ला मूल रूप से तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में कराईकुडी के रहने वाले हैं. 23 जुलाई 1951 को जन्मे खलीफुल्ला ने 20 अगस्त 1975 को अपने कैरियर की शुरुआत श्रम कानून से संबंधित मामलों के सक्रिय वकील के रूप में की. वो पहले मद्रास हाईकोर्ट में स्थाई न्यायाधीश नियुक्त किये गये और उसके बाद जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनाये गये. 2000 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के तौर नियुक्त हुए और 2011 में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाये गये.
श्रीराम पंचू एक वरिष्ठ वकील हैं जो मध्यस्थता के जरिए केस सुलझाने में माहिर मने जाते हैं. उन्होंने मध्यस्थता कर केस सुलझाने के लिए “The Mediation Chambers” नाम की एक कानूनी संस्था भी गठित की है. ये एसोसिएशन ऑफ इंडियन मीडिएटर्स के अध्यक्ष भी हैं तथा बोर्ड ऑफ इंटरनेशनल मीडिएशन इंस्टीट्यूट के बोर्ड में भी रह चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने श्रीराम पंचू को देश के सबसे पुराने विशिष्ट मध्यस्थों में से एक बताया है. इन्होंने कमर्शियल, कॉरपोरेट और कॉन्ट्रैक्ट सम्बन्धी देश के कई जटिल और VVIP मामलों में मध्यस्थता की है. जिनमें असम और नागालैंड के बीच 500 किलोमीटर भूभाग का मामला और बंबई में पारसी समुदाय का मामले शामिल हैं.
देश के प्रमुख आध्यात्मिक गुरुओं में से एक आर्ट्स ऑफ लिविंग के प्रमुख श्री श्री रविशंकर इससे पहले भी अयोध्या मामले में मध्यस्थता की कोशिश की थी, इसके लिए वह अयोध्या गए थे, पक्षकारों से तथा UP के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मुलाकात कर चुके हैं. उन्होंने मसले को सुलझाने का एक फॉर्मूला भी पेश किया था. वैसे इनका नाम मध्यस्थ के रूप में सामने आते ही कई पक्षों और कुछ बड़े साधु-संतों ने इनका विरोध भी किया है.



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